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ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाता है। इस दिन गंगा जी का पृथ्वी पर अवतरण हस्त नक्षत्र में हुआ था। इस वर्ष हृषिकेश पंचांग के अनुसार 18 जून दिन मंगलवार को सूर्यादय 5 बजकर 13 मिनट पर और दशमी तिथि का मान 55 दंड 38 पला अर्थात रात्रि 3 बजकर 28 मिनट तक है। पूर्वाह्न में हस्त नक्षत्र होने से यह दिन व्रत के लिए प्रशस्त है।
ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को ज्योतिष ग्रंथों में सम्वत्सर का मुख माना गया है। इस दिन गंगा नदी में स्नान, दान एवं उपवास का विशेष महत्व है। ब्रह्म पुराण में कहा गया है कि हस्त नक्षत्र से युक्त ज्येष्ठ शुक्ल दशमी दस प्रकार के पापों को हरने के कारण गंगा दशहरा कहलाती है। इन दस पापों में तीन कायिक- बिना अनुमति के दूसरों की वस्तु लेना, हिंसा व परस्त्रीगमन। चार वाचिक- कटु बोलना, झूठ बोलना, बुराई या चुगली करना व निष्प्रयोजन बातें करना तथा तीन मानसिक पाप हैं- दूसरे की वस्तुओं को अन्यायपूर्ण ढंग से लेने का विचार करना, दूसरों के अनिष्ट का चिंतन करना व नास्तिक बुद्धि रखना है।
स्कंद पुराण में कहा गया है- ‘ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे दशम्यां बुध हस्तयो। व्यतीतेपाते गरानन्दे कन्या चन्द्रे वृषे रवौ। दशयोगे नर: स्नानात्वा सर्वपापै: प्रमुच्यते।।’ अर्थात ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र हो, वृष राशि में सूर्य और कन्या राशि में चंद्रमा हो तो ऐसा अपूर्व योग महाफलदायक होता है। व्यक्ति के सभी पाप स्नान, दान से समाप्त हो जाते हैं। इस दिन साधक को गंगा नदी अथवा समीप के पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करना चाहिए। तदुपरान्त गंगा जी का पूजन करना चाहिए और अंत में निम्नलिखित मंत्र का यथा संभव जप करना चाहिए-
‘नम: शिवायै नारायण्यै दशाहरायै गंगायै नम:।’ यदि संभव हो तो इस मंत्र में नम: के स्थान पर स्वाहा लगाकर हवन भी करें। तत्पश्चात ‘ऊं नमो भगवती ऐं ह्रीं श्रीं हिली हिली मिलि मिलि गंगे माम् पालय पालय स्वाहा।’ इस मंत्र से पांच पुष्पांजलि अर्पण कर गंगाजी को पृथ्वी पर अवतरित कराने वाले भगीरथ जी का तथा हिमालय का पूजन करना चाहिए।

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