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ब्रह्माकुमारीज संस्था के ज्ञान सरोवर परिसर में देश-विदेश से आए मीडियाकर्मियों के मनोरंजनार्थ आयोजित सुरमयी शाम को भारत व नेपाल के सिद्धहस्त कलाकारों ने इंद्रधनुषी रंगों से सराबोर कर दिया। दर्शकों ने समय-समय पर तालियां बजाकर कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
आध्यात्मिक कवि बी.के.विवेक द्वारा खचाखच भरे हॉरमनी हॉल में संचालित इस सांस्कृतिक कार्यक्रम का शुभारंभ राज इन्स्टीच्यूट आॅफ डांस बैंगलोर के निदेशक राजू भाई के नेतृत्व में गणेश वंदना की प्रस्तुति से हुआ। इसी केंद्र के कलाकारों ने गुजराती डांडिया रास झूमो रे, झूमो रे गरबा रास रमोरे- जब प्रस्तुत किया तो असंख्य दर्शक झूम उठे। इन्हीं के मयूर नृत्य के बाद वह ताण्डव नृत्य प्रस्तुत किया गया, जिसे राजू भाई का यह ग्रुप देश-विदेश में दो हजार से अधिक मंचों पर प्रस्तुत करके वाह-वाही लूट चुका है।
शिवम नृत्य कला केंद्र इंदौर से आयी मंजूषा एवं अन्य सहयोगी कलाकारों ने बैले नृत्य के पश्चात सूफी नृत्य - ये रहम, ये रहम फरमा-ए-खुदा, प्रस्तुत करके अपार करतल ध्वनि का अिभनंदन स्वीकार किया। इसी नृत्य के दौरान सूफी गायन को बुलंदियों की ओर ले जाते हुए जब कलाकारों ने कहा कि कैसे नजरें मैं मुख से हटाऊं, तुझमें मेरा रब दिखता - तो दर्शकों के आनंद भाव चेहरों पर स्पष्ट उभर रहे थे।
अगरा से आयी मोना ने ‘ओम नमो शिवाय’ और अहमदाबाद की बालिका निधि ने लोक नृत्य - चूड़ी चमके, मोतीड़ो भड़के; प्रस्तुत करके दर्शकों को मंत्रमुगध कर दिया। सोने के सुहागा की कहावत को चरितार्थ करते हुए नेपाल की सुप्रसिद्ध लोक गायिका व रेडियो समाचार वाचिका कोमल वली ने तीन सहयोगियों के नृत्य से सजा लोक गीत जब सुमधुर स्वर में गया तो श्रोता भाव-विभोर हो उठे। इस गायन ने सिद्ध कर दिया कि संगीत की कोई भाषा नहीं होती। समूह नृत्य इंदौर के कलाकारों की एक और आकर्षक प्रस्तुति थी। इन्हीं कलाकारों ने माइम अर्थात मूक अिभनय के माध्यम से नशा और भ्रष्टाचार जैसी बुराइयों के प्रति प्रभावशाली संदेश देने का प्रयास किया।

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