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सन् 1919 में स्थापित लीग आॅफ नेशंस का प्रयोग जब असफल हो गया तो राजनैतिक क्षितिज पर एक बार फिर युद्ध के बादल मंडराने लगे, परिदृश्य अंधकार के काले साये में ढंक गया, समाज विभिन्न बुराइयों से ग्रसित हो गया और चारो ओर नैतिक पतन चरम सीमा पर पहुंच गया। इन विपरीत परिस्थितियों में द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की स्थापना 1936-37 में हुई।
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की स्थापना की कहानी इस प्रकार है। लगभग साठ वर्ष की अवस्था में दादा लेखराज नामक हीरों के एक सुप्रसिद्ध व्यापारी को अपने सत्य स्वरूप का साक्षात्कार करने, संसार के रहस्यों को समझने तथा परमात्मा के सत्य स्वरूप को पहचानने की दिव्य अनुभूति हुई। 1936-37 में जब वे लगभग 60 वर्ष के थे, उन्हें परमात्मा से मिलने की तीव्र उत्कण्ठा हुई और उस सर्वोच्चे सत्ता की ओर एक शक्तिशाली खिंचाव महसूस हुआ। अपने जीवन परिवर्तन की इस अवधि में उन्हें कई दिव्य साक्षात्कार हुए। सबसे पहले उन्हें ज्योति स्वरूप निराकार परमपिता परमात्मा शिव का साक्षात्कार हुआ। परमात्म ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने की उन्हें प्रेरणा मिली। इसी प्रेरणा के फलस्वरूप इस संस्था की स्थापना 1937 में हुई। इस संस्था का संचालन माताएं व बहनें ही करती हैं।
संस्था का मुख्यालय राजस्थान के एकमात्र हिल स्टेशन माउंट आबू में स्थित है जिसे प्यार से मधुबन (पाण्डव भवन) कहा जाता है। यहां मधुरता और वैराग्य का अनूठा संगम है। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय 5 मई 1950 को कराची से आबू पर्वत पर स्थानांतरित हुआ। इसी मधुबन में स्वयं प्रजापिता ब्रह्मा ने गहन योग साधना की तथा यज्ञ-वत्सों को दिव्य प्रेरणाएं प्रदान की। ब्रह्मा बाबा ने इसी भूमि पर 18 जनवरी 1969 को अपना शरीर छोड़ा। मधुबन में मुख्य चार धाम हैं- बाबा का कमरा, बाबा की झोपड़ी, शांति स्तंभ व हिस्ट्री हाल। यहां से थोड़ी दूर पर इसी पर्वत पर ज्ञान सरोवर स्थित। 28 एकड़ भूमि में बसा ज्ञान सरोवर सामुदायिक विकास के लिए कार्य करता है। यहां तीन कृतिम झीलें हैं। गांव व शहर का अद्भुत सम्मिश्रण इसकी विशेषता है। यूनिवर्सल हारमनी हाल, प्रशिक्षण केन्द्र, राजयोग सभागृह, आर्ट गैलरी, कई आवासीय भवन व कई भोजन कक्ष हैं। एक समय दो हजार लोग भोजन कर सकते हैं। इसके अलावा प्रशासनिक कार्यालय, अस्पताल, पुस्तकालय व अनुसंधान प्रयोगशाला यहां है। परिसर में 20 हजार फलदायक वृक्ष हैं। पूरा परिसर हरा-भरा है। यहां से थोड़ी दूर पर संस्था द्वारा निर्मित पीस पार्क है। यह स्वप्निल संसार का साकार उपवन है जहां प्राकृतिक वातावरण और मनोरंजन का अद्भुत समन्वय है। लगभग 12 एकड़ क्षेत्र में फैले इस पार्क में प्रतिदिन 20 से 25 हजार पर्यटक आते हैं। यहां से थोड़ी दूर संस्था का ग्लोबल अस्पताल व शोध संस्थान है। इसमें गरीबों व साधुओं का नि:शुल्क इलाज किया जाता है। इसकी स्थापना 1990 में हुई।
आबू पर्वत से नीचे उतरने पर आबू रोड में संस्था का कार्यालय ‘शांति वन’ है। यह संस्था का सबसे विशाल परिसर है, जो ईश्वरीय सेवा करते हुए जन-जन को परमात्म संदेश देने का कार्य कर रहा है। इसका निर्माण 1996 में शुरू हुआ और केवल एक वर्ष में बनकर तैयार हो गया। इसका फैलाव 70 एकड़ क्षेत्र में है। यहां सबसे बड़ा भोजनालय है जिसमें 50 हजार लोगों को दो घंटे में भोजन कराने की व्यवस्था है। दूध, काफी-चाय, भोजन, यातायात आदि कई विभाग हैं। यहां प्रतिदिन 7 से 10 हजार लोगों को भोजन बनता है। यहां दूध-दही की नदियां बहती हैं। सारी सामग्री यहां इफरात है, किसी चीज की कभी कमी नहीं होती। साथ ही नियमित विद्यार्थियों को परमात्मा के साथ गहन आध्यात्मिक संबंध की अनुभूति करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। यहां का मुख्य आकर्षण भव्य डायमंड जुबली हाल है जो एशिया का सबसे बड़ा बिना स्तंभ का सभागार है। इसमें 20 हजार लोग एक साथ कुर्सियों पर बैठ सकते हैं। यह संस्था लोगों को मानव जीवन के चरम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है।
ब्रह्माकुमारी पारुल

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  1. I like their preaching....

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    1. सुनी सुनाई बातो को मूर्ख लोग ही बिना किसी आधार के अपना लेते है..... आप से अनुरोध है की आप अपने नज़दीकी ब्रह्माकुमारी सेंटर पर जाए और सच जाने

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  2. AnonymousJuly 13, 2013

    मैने सुना है कि ब्रह्म्कुमरिया छुआ-छूत को बढ़ावा देती है !
    वे लोग चंदा तो सब से ले लेते है लेकिन किसी अन्य द्वारा दिए हुए भोजन को यह कह कर ठुकरा देते है कि आपका भोजन सात्विक नहीं है अरे भाई कोइ यह तो समझाये उनके शन्ति वन में परोसी जiने वाली चाय और कॉफी कब से सात्विक हो गयी ?

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