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प्रथम भाव का नक्षत्र स्वामी जिन भावों का प्रमुख कार्येश होता है उस भाव से प्राप्त होने वाले फल से संबंधित वस्तुओं के प्रति जातक को आकर्षण, चाह और कशिश होती है, अर्थात यदि प्रथम भाव का नक्षत्र स्वामी द्वितीय भाव का कार्येश हो, तब जातक को धन परिवार और खान-पान के प्रति ज्यादा आकर्षण होता है। यदि प्रथम भाव का नक्षत्र स्वामी तृतीय भाव का कार्येश हो तो जातक का आकर्षण बहन और भाई के प्रति ज्यादा होता है, यात्रा, लेखन तथा सर्वदा परिवर्तन प्रिय होता है। चतुर्थ का कार्येश हो तब मां के प्रति ज्यादा लगाव, शिक्षा क्षेत्र, भवन, वाहन के प्रति ज्यादा आकर्षण रहता है। पंचम का कार्येश होने पर सन्तान के प्रति बहुत लगाव पूजा, प्रार्थना,ध्यान, धारण, चित्र, नाटक, कला इत्यादि के प्रति आकर्षण में ज्यादा वृद्धि होती है। सप्तम का कार्येश होने पर पति-पत्नी में प्यार,कारोबारी सोच, पार्टनरशिप आदि का आकर्षण होता है।
मामा के प्रति लगाव, पालतू जानवरों के प्रति लगाव इत्यादि षष्ठम का कार्येश होने पर होता है। अष्ठम का कार्येश होने पर डरपोक, कई बातों को छिपाने वाला, स्वयं में उलझा हुआ और कामचोर होता है। यदि प्रथम भाव का नक्षत्र स्वामी नवम भाव का कार्येश हो तो पिता के प्रति प्रेम, गुरुजी के प्रति निष्ठा, ईश्वर पर श्रद्धा, यात्रा को पसन्द करने वाला और अध्यात्म, धर्म पुराण, न्याय, संस्था के प्रति आकर्षण होता है। जब प्रथम भाव का नक्षत्र स्वामी दशम भाव का कार्येश होता है तो अधिकार पसन्द, सम्मान से जीने वाला, कारोबारी सोच रखने वाला और राजनीति में रुचि रखने वाला होता है। प्रथम भाव का नक्षत्र स्वामी लाभ भाव यानी 11वें भाव का कार्येश हो तब जातक के अनेक मित्र होते हैं। वह मुनाफा कमाने वाले कारोबार में पंूजी निवेश करता है और जल्दी सफलता प्राप्त करने के अनेक तरीके अपनाता है। यदि व्यय भाव यानी 12वें भाव का कार्येश हो तो जातक पर्यटन पसंद करने वाला, काफी विलम्ब तक सोने वाला, आलसी, अकेला पसंद वाला और उसके मन में विदेश के प्रति आकर्षण रहता है। इस तरह के फलोदश प्रथम भाव के नक्षत्र स्वामी की सहायता से बताया जा सकता है।
यदि अधिक सूक्ष्मता में जानना हो तब देखा जाए कि प्रथम भाव का नक्षत्र स्वामी किस नक्षत्र स्वामी के भवन में है। उस नक्षत्र स्वामी के कारक तत्व को देखकर भी सूक्ष्म जानकारी प्राप्त होती है। जैसे प्रथम भाव का नक्षत्र स्वामी तृतीय भाव का कारक हो तो कहा जाएगा कि जातक भाई- बहन को बहुत प्रेम करने वाला और यात्रा को पसंद करने वाला होगा। यदि प्रथम भाव का नक्षत्र स्वामी बुध ग्रह के नक्षत्र में हो तो जातक लेखन पसंद करने वाला और जीवन के परिवर्तन का चाह वाला होगा। यदि मान लिया जाए कि बुध के नक्षत्र में न होकर मंगल के नक्षत्र में हो तो पूर्ण साहसी और पराक्रमी होगा। यदि प्रथम भाव का नक्षत्र स्वामी चतुर्थ का कार्येश हो तो मां के प्रति प्रेम, शिक्षा, घर, वाहन के प्रति बहुत आकर्षण होगा परन्तु प्रथम भाव का नक्षत्र स्वामी चन्द्रमा के नक्षत्र में हो तो मां के प्रति प्रेम बहुत अधिक, यदि बुध या गुरु के नक्षत्र में हो तो शिक्षा के प्रति ज्यादा आकर्षण, शुक्र के नक्षत्र में है तो वाहन का आकर्षण ज्यादा होगा। अर्थात प्रथम भाव का नक्षत्र स्वामी जिस ग्रह के नक्षत्र में हो, उस ग्रह के कारकतत्व के भाव से जुड़ा हुआ है।
ज्योतिर्विद स्वास्थ्य के बारे में अर्थात जातक के वर्ष, लम्बाई, कद आदि की जानकरी प्रथम भाव से देते हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य किस राशि या नक्षत्र में है इससे भाव शरीर विषयक जानकारी प्राप्त होती है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तयमपुर, गोरखपुर

keyword: jyotish

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  1. Achhi Jankari...Dhanywad Dwivedi Ji...Ab aap hum jaise pathakon ke liye saral jyotish sikhane wale kuchh post bhi dala karein...!!!

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  2. Jankari achi hai. Keep it up

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