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रंग में ईश्वर की प्राण तत्व की सूक्ष्म शक्तियां सन्निहित हैं। इसका उपयोग कर हम स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही एक साथ अनंत शक्तियों के स्वामी भी बन सकते हैं। आवश्यकता है केवल रंग वर्ण भेद को समझने की। जरूरत इनके समायोजन की विधि व्यवस्था जानने की है और अपने जीवन में उतारने की भी। विभिन्न रंगों के गुण धर्म व प्रभाव का उपयोग वैकल्पिक चिकित्सा में किया जा रहा है। रंगों का संबंध भावना से है। बीमारी के बारे में कहा गया है कि यह मस्तिष्क में उत्पन्न होती है और शरीर में पलती है। अर्थात बीमारी मूलत: भावना प्रधान है। रंगों का सीधा संबंध हमारे पंचकोषों एवं षटचक्रों के रंगों से है जो हमारे शरीर तंत्र के संचालक हैं। रंगों के प्रभावी गुण के कारण ही रंग चिकित्सा का प्रचलन बढ़ रहा है। इस चिकित्सा पद्धति में शारीरिक तथा मानसिक रुग्णता दूर करने साधन रंग हैं। रत्नों के प्रभाव का मूल कारण भी रंग ही हैं। इसीलिए विभिन्न रोगों के निदान में रत्नों का महत्वपूर्ण स्थान है। रंग विभिन्न बीमारियों में उपयोग में लाए जाते हैं। यह ‘फोटो मैडिसिन’ के अंतर्गत आता है। रंगाई-पुताई के अलावा नित्य प्रयोग होने वाले वस्त्रों में भी इनका उपयोग किया जाता है।
बैगनी रंग का प्रभाव सीधे दमा व अनिद्रा के रोगी पर पड़ता है। आर्थराइटिस, गाउट्स, ओडिमा तथा अनेक प्रकार के दर्द में यह सहायक होता है। इसका सीधा प्रभाव शरीर में पोटैशियम की न्यूनता को दूर करता है। बैगनी रंग से खून में लाल कणों की वृद्धि होती है। बुखार, योनि प्रदर आदि रोगों में लाभ मिलता है। शरीर में शिथिलता व नपुंसकता को दूर करने के लिए सिंदूरी रंग गुणकारी है। त्वचा संबंधी रोगों में नीला अथवा फिरोजी रंग अच्छा कार्य करता है। जो बच्चे पढ़ाई से जी चुराते हैं अथवा अल्पबुद्धि के होते हैं उनके कमरे में लाल अथवा गुलाबी रंग करावाया जाय तो उनकी एकाग्रता बढ़ेगी और बदमाशी कम होगी। पीला रंग हृदय संस्थान तथा स्नायु तंत्र को नियंत्रित करता है। तनाव, उन्माद, उदासी, मानसिक दुर्बलता तथा अम्ल पित्त जनित रोगों में यह सहायक है। इसलिए विद्यार्थी तथा बौद्धिक वर्ग के लोगों के कमरे पीले रंग के रखवाए जायं। हरा रंगा पुष्टिवर्धक है। यह उन्माद को दूर करता है और मानसिक शांति प्रदान करता है। घाव को भरने में यह जादू सा असर करता है। परन्तु उतकों व पिट्यूटरी ग्रंथि पर इस रंग का प्रभाव विपरीत भी पड़ सकता है। पेट से संबंधित बीमारी के रोगी आसमानी रंग को जीवन में उतारें। आसमानी रंग के प्रयोग से स्नायु की ताकत बढ़ती है, खून का स्राव रुकता है, प्यास कम लगती है, सिर व बालों के रोग दूर होते हैं। नारंगी रंग तिल्ली, फेफड़ों तथा नाड़ियों पर प्रभाव डालकर उन्हें सक्रिय बनाता है। यह रंग रक्तचाप को भी नियंत्रित करता है। यही नहीं बुखार, मानसिक पीड़ा, पागलपन, बातरोग, निमोनिया, दमा, क्षय, अस्थमा, खूनी दस्त, अनिद्रा व श्वांस संबंधी रोग, कम सुनाई देना, पथरी व मूत्र रोगों में भी गुणकारी है। लाल रंग भूख बढ़ाता है। सर्दी, जुकाम, रक्तचाप तथा गले के रोगों में भी यह रंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पक्षाघात वाले रोगियों को सफेद पुते कमरे में रखने तथा अधिकाधिक सफेद परिधान प्रयोग करवाने से चमत्कारिक रूप से लाभ मिलता है।
मानव शरीर में रासायनिक द्रव्यों के कारण रंगों का असंतुलन हो जाता है, जिससे बीमारियां जन्म लेती हैं। रंग चिकित्सा के लिए बीमारी से संबंधित रंग की कांच की बोतल में पानी भरकर 6 से 8 घंटे धूप में रखकर शाम को पीने से लाभ मिलता है।
सावधानी- रंगों का प्रयोग करने पूर्व किसी रंग विशेषज्ञ से सलाह अवश्य ले लें।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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