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दिल्ली का बादशाह सिकन्दर लोदी बनारस आया। उसके सामने नगर के काजी ने शिकायत की थी कि यहां पर कबीर नामक उपदेशक लोगों को इस्लाम के विरुद्ध नसीहत देता है जिससे मुसलमान कुरान के मार्ग से हटकर हिन्दुओं की तरह ध्यान और भजन करने लग गए हैं साथ ही कुछ प्रमुख हिन्दुओं ने भी कहा कि कबीर परम्परा से चले आए धार्मिक और सामाजिक नियमों पर प्रहार करता है और लोगों को ऐसे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है जिसे न हिन्दू कहा जा सकता है और न मुसलमान। वह स्वयं ही सबका गुरु बनकर अपना नया संघ चला रहा है। यद्यपि धर्म के नाम पर एक ही व्यक्ति के विरुद्ध हिन्दू- मुसलमानों द्वारा शिकायत किया जाना एक नई बात थी तो सिकन्दर लोदी ने एक शासक की हैसियत से कबीर को दरबार में हाजिर होने का हुक्म दिया। उनके आने पर मुसलमान और हिन्दुओं द्वारा कही गई शिकायतें उनको बतलाई और भविष्य में इस प्रकार के सिद्धान्तों का प्रचार न करने की आज्ञा दी। सरकारी फैसले की बात सुनकर कबीर साहब ने कहा हिन्दू- तुरक कहां से आए। कबीर साहब का कहना था कि हिन्दू और मुसलमान धर्म आखिर कहां से आए। ये सृष्टि के आदि से तो नहीं है, बीच में ही किन्ही आचार्यो या धर्मोपदेशकों ने इसका प्रचार किया है। अगर ये परमात्मा द्वारा ही प्रेरित होते तो इनमें इतना भेद-भाव नहीं होता और न इसके अनुयायी आपस में लड़ते-झगड़ते। इससे मालूम होता है कि इनके सिद्धान्तों में कुछ त्रुटियां रह गई हैं अथवा बाद में नये-नये विचारकों और आचार्यों ने पारस्परिक विरोधी परिवर्तन कर दिए।
कुछ भी हो कबीर हानिकारक मतभेदों को सार्थक बनाने योग्य सरल और सच्चे सिद्धान्तों पर अमल करने की बात समझते हैं। वह जमाना इस प्रकार के तर्क और न्यास की बातों को सहज में मान्यता दे सकने का नहीं था। हिन्दू और मुसलमान दोनों मजहबों के गुरुओं में अहमन्यता और स्‍वार्थ के भाव भरे थे और वह यह सहन करने को तैयार न थे कि कोई नया आदमी जनता को उनके प्रभाव से निकाल कर अपना अनुयायी बना ले। इसलिए इस प्रकार के धर्मजीवी लोगों ने बादशाह को खूब भड़काया। मुसलमान बादशाह स्वयं भी तलवार के जोर से धर्म प्रचार में विश्वास करते थे। इसलिए सिकन्दर लोदी ने कबीर को दण्डनीय समझा। कबीर पंथियों के कथानुसार बादशाह ने 52 प्रकार के उपायों से कबीर साहब को बहकाने का प्रयत्न किया पर दैवी शक्ति के चमत्कार के कारण उनमें से कोई कारगर नहीं हो पाया। अन्य लोगों के मतानुसार काशी की जनता का एक बड़ा भाग कबीर साहब की शुद्धता और परोपकारिता से प्रभावित था। उनका परिचय पाकर बादशाह ने उनको छोड़ देना ही उचित समझा। कुछ भी हो कबीर जैसे सत्य की राह पर चलने वाले कभी अन्याय के सामने सिर नहीं झुका सकते और उनकी आत्मशक्ति अंत में उनको विजयी बनाती है।
कबीर साहब के जन्म के संबंध में लोगों में काफी मतभेद है। अधिकांश लोगों का मत है कि वे एक सद्यजात शिशु के रुप में काशी के लहरतारा तालाब पर नीरु जुलाहे को मिले थे। कुछ लोग इनको नीरु का पुत्र ही बतलाते हैं। जनता में वे नीरु (पिता) और नीमा (माता) के पुत्र के रूप में प्रसिद्ध थे, इन्होंने अपनी अनेक रचनाओं में अपनी जाति जुलाहा ही लिखी है। कबीर अपने सिद्धान्त के पक्के थे। वे जानते थे कि सच्चाई किसी खास मजहब से बंधी हुई नहीं है, जो कोई अपनी अन्तरात्मा में घुसकर निष्पक्ष भाव से उसकी खोज करेगा, वहीं उसे प्राप्त कर सकेगा। उनके स्वतंत्र चिन्तन द्वारा छोटी अवस्था में उन्होंने इसे प्राप्त कर लिया और डंके की चोट पर कहने लगे, दुई जगदीश कहां से आया, इसके साथ ही हिन्दू मुसलमान के अंधविश्वासों और रुि‍ढ़वादिता की तीब्र आलोचना करने लगे।
कबीर के जीवन की दूसरी अनुकरणीय बात यह है कि उन्होंने शारीरिक श्रम की महत्ता को स्वीकार किया, सदैव अपने पेशे को करते रहे। कबीर कपड़ा बुनने में ही भगवान की भक्ति और आध्यात्मिकता का अनुभव कारने लगे। उनके समय में और आजकल भी हिन्दुओं में भक्त एक लक्षण यह भी मान लिया गया है कि गृहस्थ जीवन के सांसारिक कर्तव्यों को त्यागकर केवल भजन उपासना में ही सब समय व्यतीत किया जाए। इस हानिकारक मनोवृत्ति का परिणाम यह हुआ कि देश में लाखों अकर्मण्या साधु और सन्यासियों का अविर्भाव हो गया, जिनके जीवन निर्वाह का भार समाज को उठाना पड़ रहा है। परन्तु कबीर ने अपने व्यक्तित्व उदाहरण से इसका प्रतिकार किया और एक महान संत होते हुए भी अपने परिश्रम की कमाई से ही सदैव अपना जीवन निर्वाह किया। कबीर ने सामान्य जनता के लिए ऐसा मार्गदर्शन दिया जिससे वे सच्चाई, ईमानदारी, परोपकार का जीवन व्यतीत करते हुए समाज में सम्मान पूर्वक स्थिति प्राप्त कर सके। बुद्ध, ईसा और सुकरात जैसे संसार के बड़े धर्मज्ञ और ज्ञानी पुरुषों ने मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार उसके चरित्र, नैतिकता और परोपकारिता को ही बताया है। संत कबीर इसी मार्ग के अनुयायी है। पण्डित जवाहर लाल नेहरु जैसे आधुनिक विचार के महानुभावों ने कबीर की महत्ता स्वीकार करते हुए लिखा है 'कबीर बहुत लोकप्रिय हो गए थे ' । उनके भजन बहुत दूर-दूर के गांवों तक में खूब प्रचलित थे। वह न हिन्दू थे और न ही मुसलमान। वह हिन्दू- मुसलमान दोनों थे या दोनों के बीच के थे और दोनों मजबह तथा और जाति के अनुयायी थे। कहते हैं कि जब वह मरे तो उनका शव एक चादर से ढ़ंका था। हिन्दू चेले उसे जलाना चाहते थे और मुसलमान शागिर्द दफन करना चाहते थे। इस पर दोनों में विवाद और झगड़ा बढ़ गया। जब चादर हटायी गई तो देखा कि वह शरीर जिसके लिए वे झगड़ रहे थे गायब है। उसकी जगह कुछ ताजे फूल पड़े थे। मुमकिन है कि यह कहानी काल्पनिक हो लेकिन है बहुत सुन्दर। उनकी दृष्टि में जाति-पाति, कुल वंश, परिवार और पद- प्रतिष्ठा नहीं बल्कि व्यक्ति का व्यक्तित्व और आंतरिक निष्ठा ही अधिक महत्वपूर्ण थी। इस आदर्श को लेकर जीने वाले व्यक्ति ही अपने जीवन में आदर्श सेवा के लिए नवयुग के निर्माण के लिए कुछ कर पाने में समर्थ हो सकते है। 120 वर्ष की आयु में संत कबीर का देहान्त 1580 ई.में हुआ।
अपने अन्तिम समय में वे मगहर चले गए थे क्योंकि लोगों की मान्यता थी कि मगहर में मरने वाला व्यक्ति नर्क को जाता है। मरने के बाद अंध विश्वास टूटे इसके लिए कबीर कितने यत्नशील थे।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी, आजाद नगर, रूस्तयमपुर, गोरखपुर

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  1. really we need a leader like KABEER .this type of person can solve our religion based problems .relevant post .thanks
    धर्म की राजनीति चमकाने का वक्त नहीं है ये !

    हर बात को धर्म से क्यों जोड़ देते हैं ZEAL जैसे लोग?

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