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यह समय चक्र है। अविरल गति से घूमता रहता है। चार युगों का चक्र पूरा होने के बाद यह सृष्टि हूबहू रिपीट होती है। पांच हजार वर्ष का एक सृष्टि चक्र होता है जिसमें चारो युगों का पूरा वृतांत है। अब यह पुरानी दुनिया के अंत और सतयुग के आदि का युग है। अब संगम युग में नई दुनिया की स्थापना हो रही है। यह मनुष्य सृष्टि, प्रकृति-पुरुष का एक अनादि खेल है। हम देखते हैं कि स्वास्तिक सृष्टि चक्र को चार बराबर भागों में बांटता है। लोग स्वास्तिक की रेखा को शुभ मानते हैं और प्रत्येक कार्य के प्रारंभ में इसे बनाते हैं, लेकिन इसके अर्थ व महत्व को नहीं जानते।
वास्तव में स्वास्तिक का चिन्ह इस सृष्टि के चार युगों को स्पष्ट करता है। यह सृष्टि चार युगों को दर्शाती है। इस सृष्टि चक्र की आयु पांच हजार वर्ष होती है, जिसमें से दो युग यानी सतयुग व त्रेता स्वर्ग तथा द्वापर व कलियुग आयरन एज अर्थात नर्क की श्रेणी में आते हैं। प्रत्येक युग की आयु 1250 वर्ष होती है। चार युगों की पूरी आयु पांच हजार वर्ष की होती है जिसमें
मनुष्य के उत्थान व पतन का पूरा वृतांत निहित है। इन चार युगों में मनुष्यात्माएं सत, रज, तम की स्थिति से गुजरती हैं। कलियुग आते-आते आत्मा तमोगुण प्रधान हो जाती है। तब परमात्मा पुन: आत्मा को सतगुण प्रधान बनाने तथा नई दुनिया की स्थापना के लिए अवतरित होते हैं और नई दुनिया के निर्माण का कार्य प्रारंभ होता है। स्वयं परमपिता परमात्मा शिव कलियुग के अंत और सतयुग के आदि अर्थात संगम युग पर अवतरित होकर प्रजापिता ब्रह्मा के मुख से सच्चा गीता का ज्ञान दे रहे हैं। अत: हम सभी का कर्तव्य है कि परमात्मा के बताए मार्ग पर चलें और जीवन को सफल बनाएं। अभी नहीं तो कभी नहीं।

सतयुग
इस चक्र में सबसे पहले सतयुग दिखाया गया है। यहां स्वास्तिक की भुजा दायीं ओर है। दायीं भुजा अच्छाई व शुभ का सूचक मानी जाती है। आदि काल में सनातन धर्म के लोग दैवीगुण, श्रेष्ठ कर्म और सरल स्वभाव वाले थे। तब उन्हें संपूर्ण सुख-शांति प्राप्त थी। आज यदि कोई मनुष्य अच्छे स्वभाव का होता है तो लोग कहते हैं कि यह तो जैसे कोई देवता है। वहीं कोई मनुष्य चरित्रहीन होता है, दूसरों को दु:ख देता है या अकाल मृत्यु या अन्न-धन की कमी होती है तो लोग कहते हैं कि भाई! कलियुग जो है। कलियुग में तो ऐसा ही होता है। आज कोई सतयुग थोड़े ही है कि लोग ईमानदार, सतोगुणी हों या पदार्थ सतोप्रधान हो। इससे स्पष्ट है कि सतयुग में मनुष्य 16 कला संपूर्ण, सतोप्रधान एवं दैवी गुण वाले थे।

त्रेतायुग
सतयुग के बाद त्रेतायुग आता है। यहां भी लोग पवित्रता, सुख-शांति से संपन्न थे। त्रेतायुग आते ही मनुष्य की दो कलाएं कम हो जाती हैं। यहां मनुष्य की 14 कलाएं होती हैं। इसलिए यहां स्वास्तिक की भुजा नीचे की ओर है। क्योंकि अब मनुष्य सतोप्रधान से उतरकर सतो-सामान्य अवस्था में आ गया। सतयुग में जहां सूर्यवंशी घराना था, वहीं त्रेतायुग में चंद्रवंशी घराना होता है। इसमें श्रीराम-सीता का राज्य होता है। यहां भी लोगों में आत्मिक शांति होती है परन्तु सतयुग की अपेक्षा थोड़ी कम हो जाती है। यहां दो कलाएं कम होने के कारण मनुष्यों की आयु में भी फर्क हो जाता है और आयु सीमा कम हो जाती है। जिसके कारण यहां 12 जन्म होते हैं, लेकिन देवी-देवताओं का साम्राज्य यहां भी होता है।

द्वापरयुग
सतयुग और त्रेतायुग के सूर्यवंश तथा चंद्रवंश की आत्माएं अनेक जन्म सुख भोगने के बाद वाम मार्ग में चली जाती हैं। यहां स्वास्तिक की भुजा बायीं ओर दिखाई गई है, क्योंकि बायां हाथ अपवित्रता का सूचक माना गया है। सृष्टि में आदि सनातन देवी-देवता व धर्म में गिरावट आने से अन्य धर्म स्थापित होने लगते हैं। द्वापर में आत्मा के अंदर केवल नौ कलाएं रह जाती हैं। यहां प्रत्येक आत्मा रजोगुण अवस्था में होती है। यहीं से इस्लाम, बौद्ध व इसाई आदि धर्मों की स्थापना होती है। इस युग से ही भक्ति भाव की प्रथा प्रारंभ होती है। अनेक धर्म होने के कारण अब कलह-क्लेश, लड़ाई-झगड़ा भी प्रारंभ हो जाता है। काम-क्रोधादि विकारों के कारण दु:ख तथा अशांति की सृष्टि में प्रवेशता हो जाती है।

कलियुग
अब आती है कलियुग की बारी। द्वापरयुग के अंत तक आते-आते बुरे कर्मों के कारण मनुष्यात्माएं कलाविहीन हो जाती हैं। यहां से पूरे मानव जाति में लड़ाई-झगड़ा, दु:ख-अशांति बढ़ने लगती है। मनुष्यों के अंदर बुराइयां व आसुरी प्रवृत्तियां घर कर जाती हैं। इसलिए इस युग में स्वास्तिक की भुजा ऊपर की ओर दिखाई गई है। इस युग में लोग तमोगुण की प्रधानता से आसुरी स्वभाव के हो जाते हैं और धर्म की अत्यंत ग्लानि हो जाती है। जब पूरी दुनिया में अराजकता, आतंकवाद, मार-काट, नैतिक मूल्यों का पतन, आसुरी शक्तियों का साम्राज्य हो जाता है, तब परमात्मा का अवतरण होता है। कलियुग की समाप्ति और सतयुग के प्रारंभ में संगमयुग पर अवतरित होकर सर्व मनुष्यात्माओं को ज्ञान व राजयोग की शिक्षा देते हैं और नई दुनिया का निर्माण करते हैं।

ब्रह्माकुमारी पारुल, प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय मोहद्दीपुर, गोरखपुर केन्द्र
(प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के मुखपत्र ‘शिव आमंत्रण’ से साभार)

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  1. Achhi Jankari Ke liye Dhanyawad...Yeh ek vyapak vishay hai, jise aur bhi bade tarike se athakon tak panhuchana chahiye....Dhanyawad Dwivedi Ji...!!!

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  2. Thank you so much...it had been sounding cliched the fact that all kinds of evils today is because it is kalyug. Through ur post I learnt two very important aspects of our very own sanathan dharma. First and foremost the significance and the real symbolism for Swastik chinh and secondly about the characteristics and duration of the four yugas. I feel rich for the day...by yet another degree. Thank u very much indeed. :)

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gajadhardwivedi@gmail.com

 
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