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यंत्रों के निर्माण की अपनी प्रक्रिया है। जब यंत्र विधि पूर्वक संकल्प, पूजन, न्यास और अभीष्ट देवता के मंत्र एवं कवच स्तोत्र से अभिमंत्रित हो जाते हैं तो वे कवच यंत्र कहलाते हैं। यंत्र निर्माण में यह प्रक्रिया उतनी सशक्त रूप से नहीं होती है जितना कवच यंत्र निर्माण में। यंत्र कवच निर्माण प्रक्रिया में कुछ निश्चित संख्या में जप व कवच स्तोत्र का पाठ आवश्यक माना गया है। इसके बाद हवन किया जाता है और हवन का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन और यथेष्ठ दानादि सहित सत्पात्रों को भोजन कराया जाता है।

महामृत्युंजय कवच यंत्रम्
इस कवच के निर्माण के लिए किसी शुभ मुहूर्त में शुद्ध, शांत चित्त, संयम पूर्वक, देवालय (विशेषकर शिव मंदिर) या नर्मदेश्वर शिवलिंग के समीप या गंगादि तीर्थ स्थल, जलाशय, पीपल वृक्ष के पास अथवा अपने निवास स्थल पर जिस व्यक्ति के लिए निर्माण करना है उसके लिए संकल्प करें और भोजपत्र पर या चांदी के पत्र पर इसे बनाएं, पुन: 11 या 22 अथवा 33 माला महामृत्युंजय जप करें। पुन: इस यंत्र की स्थापना न्यास सहित करके स्थापित करें, 51 बार या 108 बार मृत्युंजय कवच का पाठ कर इसे अभिमंत्रित कर लें। पुन: जप संख्या और कवच स्तोत्र संख्या का दशांश हवन करें और उसका दशांश तर्पण और तर्पण का दशांश मार्जन करें। मार्जन का दशांश ब्राह्मण को भोजन कराएं। कवच पाठ के अंत में जातक के दीर्घायु के लिए प्रार्थना करें, पुन: इसे किसी शुभ मुहूर्त में धारण किया जाय।
लाभ- महामृत्युंजय कवच धारण करने से अकाल मृत्यु का निवारण हो जाता है। दीर्घायु और आरोग्यता प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त जन्म कुण्डली में ग्रह- नक्षत्र दोष, नाड़ी दोष, मांगलिक दोष, शत्रु षडाष्टक योग, विधुर एवं वैधव्यादि दोषों के निवारण हेतु एवं अतिशय क्लिष्ट एवं असाध्य रोगों और मृत्यु तुल्य शारीरिक व मानसिक कष्टों या रोगों में उपाय स्वरूप अचूक एवं सिद्ध यंत्र कवच माना जाता है। इसका प्रभाव जातक पर सामान्यत: तीन वर्ष रहता है। अधिक संख्या में जप संख्या और कवच स्तोत्र संख्या के पाठ से इसकी अवधि 7 वर्ष या 11 वर्ष तक की जा सकती है। यह पुरुष के दाहिने और स्त्री के बाएं हाथ में बांधना चाहिए। यदि असुविधा हो तो इसे गले में भी धारण किया जा सकता है। इसमें जहां गोत्र का नाम है वहां उसके गोत्र और श्री.. के आगे जातक के पिता का नाम, तृतीय रिक्त स्थान में उस व्यक्ति के नाम को लिखना होता है जिसके लिए कवच बनाया जा रहा है। यदि इसके साथ ‘ऊं जूं स:’ का नित्यप्रति जप भी किया जाय तो यह बहुत कारगर सिद्ध होता है। इसे धारण करने से विलक्षण आनंद की अनुभूति होती है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

keyword; kavach, yantra

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  1. भाई क्या स्तोत्र के भी दशांश हवन किये जाते हैं ? जैसे कि शिव पंचाक्षरी स्तोत्र है, और दत्तात्रेय जी का भी है. क्या इस स्तोत्र के पाठ के भी दशांश हवन होने चाह्चिये? धन्यवाद.

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