0
हां! मैं भगवान से मिली हूं। आत्मा को परमपिता मिल रहे हैं, यह मैंने अनुभव किया। मैं आत्मा हूं, यह मैंने महसूस किया है। ब्रह्मा बाबा की अनुकंपा से जब मैं स्वयं के मार्ग पर चली तो भगवान मुझसे मिलने लगे और पवित्रता, निर्मल व शुद्ध प्रेम मैंने अनुभव किया। फलस्वरूप जो शांति उतरी वह अद्भुत है। पूरी दुनिया को उस शांति की जरूरत है।
यह बातें प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय माउण्ट आबू आर्इं राजयोग प्रशिक्षिका बीके सावित्री दीदी ने कही। वह यहां मोहद्दीपुर गोरखपुर केन्द्र में आयोजित मम्मा के स्मृति दिवस समारोह में भाग लेने आई हैं। धर्मचक्र के साथ वह बातचीत कर रही थीं। यह पूछने पर कि जो परमात्मा का प्रेम आपने अनुभव किया, क्या उसी को समाधि कहते हैं या वह समाधि से इतर है? सावित्री दीदी ने कहा कि समाधि या मोक्ष विकारों से मुक्ति, दुर्गणों से मुक्ति, दु:ख व अशांति से मुक्ति है, प्रेम समाधि तक पहुंचने का मार्ग है। परमात्मा से मेरे प्रेम संबंध हैं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि अब वह निज परिवर्तन की यात्रा पर हैं। सर्वगुणों को पवित्र बनाना है और सर्वगुणों को धारण करना है।
आप इस संस्था से कैसे जुड़ी? इस सवाल पर उन्होंने कहा कि पड़ोसी के जरिए जुड़ी और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1966 में इस संस्था से जुड़कर जो मैंने जाना और अनुभव किया, वह सभी को अनुभव करने योग्य है। इसी प्रेरणा ने मुझे इस संस्था का समर्पित कार्यकर्ता बना दिया। प्रदर्शनी लगती थी और उसमें चित्रों द्वारा लोगों को मैं समझाती थी कि आत्मा का परमात्मा से कैसे मिलन होगा। उस समय आध्यात्मिक मेले लगते थे। कालेज में पढ़ने भी गई, पढ़ाने भी गई। कुवैत-अमेरिका की लड़ाई चल रही थी, मैंने विद्यार्थियों से कहा कि विश्व शांति के लिए तीन मिनट का अनुदान करें, विद्यार्थी राजी हो गए, फिर रोज तीन मिनट के लिए मौन बैठकर विश्व शांति में अपना योगदान देने लगे। व्याख्यान व प्रदर्शनी के माध्यम से भी मैंने लोगों को परमात्मा की ओर चलने के लिए प्रेरित किया। इंडस्ट्रीज में भी जाती थी और लोगों को आध्यात्मिकता का संदेश देती थी। उन्होंने कहा कि यह मार्ग प्रवृत्ति में रहते हुए ज्ञान मार्ग है। जिसमें ज्ञान व योग से बुराई को छोड़ने की ताकत आती है। उन्होंने कहा कि 16 वर्ष मैंने कालेज में पढ़ाया। इसके बाद 18 जनवरी 1992 को मैंने माउण्ट आबू जाने के लिए सोचा, फिर सोचा अब माउण्ड आबू जाना तो फिर लौटना क्या, सो अपने प्राचार्य को इस्तीफा भेज दिया। प्राचार्य ने बहुत समझाया, इस्तीफा भी मंजूर नहीं किया, लेकिन मैंने कहा कि ऊपर वाला बुला रहा है तो अब क्या रुकना। यहीं से शुरू हो गई मेरी यात्रा जो आज तक अनवरत जारी है।

keyword: charcha

नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा

Post a Comment

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top