0
संतों के कई संप्रदाय हैं जिनमें पत्नी न रखने का विधान है। पर कई संप्रदाय ऐसे भी हैं जिनमें गृहस्थ जीवन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। सिख धर्म भी इन्हीं संप्रदायों में से एक है, जिसके गुरुओं व संतों ने गृहस्थ धर्म में रहकर आत्म कल्याण और लोक सेवा का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत किया है। सिख धर्म के संस्थापक और आदि गुरु नानक का विवाह 19 वर्ष की आयु में हुआ। गृहस्थ होने पर भी वे विरक्त की भांति भावना रखे। इनके दो पुत्र हुए। प्रथम पुत्र श्रीचंदजी उदासीन संप्रदाय के प्रवर्तक और दूसरे लक्ष्मीदास थे। द्वितीय गुरु अंगद जी भी गृहस्थ थे। इनकी धर्मपत्नी का नाम जीवी था। इनकी चार संतानें हुर्इं जिसमें दो पुत्र व दो पुत्रियां थीं। तीसरे गुरु अमरदास हुए, इनकी पत्नी का नाम रामकुंवर था, इनकी भी चार संतानें थीं- दो पुत्र व दो पुत्री। चौथे गुरु रामदासजी का विवाह गुरु अमरदास जी की कन्या भानीकुंवर से हुआ। इनके तीन पुत्र हुए- पृथ्वीचंद, महादेव व अर्जुनदेव। सबसे छोटे पुत्र अर्जुनदेवजी को उन्होंने गद्दी सौंपी। पांचवें गुरु अर्जुनदेव जी के दो विवाह हुए। पहला मोड़गांव के चन्दनदास खत्री की कन्या रामदेवी के साथ और दूसरा कृष्णचंद्र की पुत्री गंगा देवी के साथ। प्रथम स्त्री से कोई संतान न थी। दूसरी से भी कई वर्ष तक संतान न हुई। बहुत दिन बाद गंगा देवी के गर्भ से एक बालक ने जन्म लिया जिसका नाम हरगोविन्द सिंह रखा गया, यही छठें गुरु बने। गुरु हरगोविन्द जी के तीन विवाह हुए। पहला उल्लेगांव में नारायणदासजी की पुत्री दामोदरी के साथ। दूसरा अमृतसर निवासी हरिचंद जी की पुत्री नानकी के साथ। तीसरा मन्दयाली के दयाराम की पुत्री महादेवी के साथ। प्रथम पत्नी से पुत्र गुरुदित्ता और कन्या बीबी वीरोजी थी। द्वितीय पत्नी से तेगबहादुर और तीसरी पत्नी से तीन पुत्र सूरजमल, हरराम और अटलजी हुए। इसके साथ ही गुरुजी के एक और विवाह का पता चलता है। एक मुसलमान काजी की कन्या कौल्ला उनके पास किसी प्रकार आ गई। वह बहुत रूपवती व बुद्धिवती थी। गुरु साहब उसपर बहुत अनुराग रखते थे। गुरु साहब ने उसके नाम पर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के पास एक सरोवर बनवा दिया और उसका नाम कौलसर रखा। गुरु हरगोविन्द जी अपने पौत्र हरराय से विशेष प्रेम रखते थे। उन्हें ही अपना उत्तराधिकारी बनाया। सातवें गुरु हरराय का विवाह 1704 में दयाराम की पुत्री कृष्णकौर से हुआ। उनके दो पुत्र हुए- रामराय व हरकिशन। अपने छोटे पुत्र हरकिशन को उन्होंने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। तब वे केवल पांच वर्ष के थे। गुरु गद्दी प्राप्त करने के तीन वर्ष बाद ही आठ वर्ष की आयु में वे स्वर्गवासी हो गए। इसलिए उनका विवाह न हो सका। अर्थात एकमात्र आठवें गुरु का विवाह नहीं हुआ। नौवें गुरु तेगबहादुर का विवाह लालचंद की पुत्री गुजरी देवी से हुआ। इनके दो पुत्र हुए जिनमें से एक गुरु गोविन्द सिंह थे। दसवें गुरु गोविन्द सिंह की दो पत्नियां थीं। उनका बड़ा पुत्र अजित सिंह मुसलमान आक्रमणकारियों के साथ लड़ता हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। दूसरे पुत्र जुझार सिंह ने भी इसी प्रकार वीरगति प्राप्त की। दो छोटे पुत्र जोरावर सिंह व फतेह सिंह मुसलमानों द्वारा पकड़े गए और दुश्मनों ने उन्हें जीवित ही दीवाल में चुनवा दिया। इस प्रकार गुरु गोविन्द सिंह के चारो पुत्र धर्म के लिए बलिदान हो गए। इस प्रकार सिख गुरुओं ने एक अनुकरणीय परंपरा की स्थापना की।
आचार्य शरदचंद्र


नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा

Post a Comment

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top