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हर कौम व मजहब में कोई न कोई खुशी का दिन होता है। इस्लाम में मुसलमानों को दो त्योहार दिए गए हैं- ईदुलफितर व ईदुल अजहा (बकरीद)। बंदा जब रोजा और तराबीह जैसी मुश्किल तरीन इबादत को पूरा करता है तो उसको बदले में एक दिन खुशी का दिया जाता है। इस ईद के मौके पर हर इंसान जितना भी हो सके, अपनी हैसियत के हिसाब से इंसानियत के दायरे में रहते हुए खुशी का इजहार करे। ऐसा न हो कि खुशी में बदमस्त हो जायं। खासतौर से इस खुशी का दिन आने से पहले अपने पड़ोस या रिश्तेदारों में जो लोग गरीब हैं, उनको सदका-ए-फितर दिया जाय ताकि वे इस सदके की रकम से अपनी भी जरूरतों को पूरा कर सकें और उनके बच्चे भी नये-नये कपड़ों को पहन कर इस खुशी में शरीक हो जायं। इस्लाम की मान्यता है कि हर मालदार गरीब का कर्जदार है, इसीलिए इस्लाम ने ईद आने से पहले-पहले गरीबों को सदका-ए-फितर देना फर्ज कर दिया है।

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