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दारुल उलूम हुसैनिया इमामबाड़ा दीवान बाजार के सहायक अध्यापक मोहम्मद आजम ने कहा कि इस्लाम के दूसरे खलीफा जिनके तकवा परेहजगारी का यह आलम था कि ईद के दिन जारों कतार रो रहे हैं।
ईद के दिन लोग काशान-ए-खिलाफत पर हाजिर हुए तो क्या देखा कि आप हजरत उमर दरवाजा बन्द करके जारों कतार रो रहे हैं। लोगों ने हैरान होकर तअज्जूब से अर्ज किया, या अमीरूल मोमिनीन! आज तो ईद का दिन है। आज तो शादमानी मुसर्रत और खुशाी मनाने का दिन है। ये खुशी की जगह रोना कैसा? आप ने आंसू पोंछते हुए फरमाया ऐ लोगों! ये ईद का दिन भी है और वईद का दिन भी है। आज जिसके नमाज रोजा मकबूल हो गए बिला सुबह उसके लिए आज ईद का दिन है। लेकिन आज जिसकी नमाज रोजा को मरदूह करके उसके मुहं पर मार दिया गया हो उसके लिए तो आज वईद ही का दिन है। और मैं तो इस खौफ से रो रहा हूं कि आह! यानी मुझे ये मालूम नहीं कि मैं मकबूल हुआ हूं या रद्द कर दिया गया हूं।

शहजादे की ईद

हजरते सय्येदुना उमर ने एक मर्तबा ईद के दिन अपने शहजादे को पुरानी कमीज पहने देखा तो रो पड़े, शहजादे ने अर्ज किया, प्यारे अब्बा जान! आप किस लिए रो रहे हैं? आपने फरमाया- बेटे मुझे अन्देशा है कि आज ईद के दिन जब लड़के तुझे इस फटे- पुराने कमीज में देखेंगे तो तेरा दिल टूट जाएगा। शहजादे ने जवाबन अर्ज किया- दिल तो उसका टूटे जो रजाए इलाही को न पा सका या जिसने मां या बाप की नाफरमानी की हो और मुझे उम्मीद है कि आप की रजामंदी के तुफैल अल्लाह तआला भी मुझसे राजी होगा। यह सुनकर हजरते उमर रो पड़े। शहजादे को गले लगाया और उस के लिए दुआ की।

शहजादियों की ईद
अमीरूल मोमिनीन हजरते उमर बिन अब्दुल अजी़ज की खिदमत में ईद से एक दिन कब्ल आप की बच्चियां हाजिर हुईं और बोली बाबा जान कल ईद के दिन हम कौन से कपड़े पहनेंगी? फरमाया यही कपड़े जो तुमने पहने रखे हैं इन्हें आज धो लो और कल पहन लेना। नहीं बाबा जान! आप हमें नए कपड़े बनवा दें। बच्चियों ने जिद करते हुए कहा।
आप ने फरमाया। मेरी बच्चियों! ईद का दिन अल्लाह की इबादत करने और उसका शुक्र बजा लाने का दिन है नए कपड़े पहनना जरूरी तो नहीं।
बाबा जान! आप का फरमान बेशक सही और दुरूस्त है लेकिन हमारी सहेलियां और दूसरी लड़कियां हमें ताने देंगी कि तुम अमीरूल मोमिनीन की लड़कियां हो और वही पुराने कपड़े पहन रखे। बच्चियों की बातें सुनकर अमीरूल मोमिनीन का दिल भी भर आया। आपने खाजिन को बुलाकर फरमाया मुझे मेरी एक माह की तनख्वाह पेशगी ला दो। खाजिन ने अर्ज किया कि हुजूर क्या आप को यकीन है कि आप एक माह तक जिन्दा रहेंगे? आप ने फरमाया तूने बेशक उम्दा और सही बात कही। खाजिन चला गया। आपने बच्चियों से फरमाया प्यारी बच्चियों! अल्लाह व रसूल की रिजा पर अपनी ख्वाहिशात का कुरबान कर दो। कोई शख्स उस वक्त जन्नत का मुस्तहिक नहीं बन सकता। जब तक वो कुछ कुर्बानी न दे।
गुजश्ता दोनों हिकायत से हमें यही दर्स मिला कि उजले कपड़े पहन लेने का नाम ईद नहीं है । रंग बिरंगे कपड़े पहने बगैर भी ईद मनाई जा सकती है। हजरते अमीरूल मोमिनीन किसा कदर गरीब व मिसकीन खलीफा थे। इतनी बड़ी सल्तनत के हाकिम होने के बावजूद आपने कोई रकम जमा न की थी। आप के खाजिन भी किस कदर दियानतदार थे।

हुजूर गौसे आजम की ईद 

अल्लाह के मकबूल बन्दों की एक- एक अदा हमारे लिए मोजिबे सद दर्सें इब्रत होती है। देखिए हमारे हुजूर गौसे आजम की शान कितनी जबरदस्त और अरफअ व आला है लेकिन बावजूद इतनी बड़ी शान होने के हमारे लिए आप क्या चीज पेश फरमाते हैं। पढ़िए और इब्रत हासिल कीजिए।
खल्क गोयद कि फरदा रोजे़ ईद अस्त।
खुशी दर रूहे हर मोमिन पदीद अस्त।
दरां रोजे़ कि बा ईमां ब-मीरम।
मिरा दर मुल्के खुदआँ रोजे़ ईद अस्त।
यानि लोग कह रहे है कल ईद है। कल ईद है। और सब खुश हैं लेकिन मैं तो जिस दिन इस दुनिया से अपना ईमान महफूज लेकर गया। मेरे लिए तो वही दिन ईद का होगा।
क्या शाने तक्वा है। इतनी बड़ी शान कि अवलिया किराम के सरदार और इस कदर तवाजोअ इन्किसार । यह सब कुछ हमारे दर्स के लिए है।

एक वली की ईद

हजरते शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल हजरत बाबा फरीद के भाई और खलीफा हैं उनका लकब मुतवक्किल है। ये सत्तर बरस शहर में रहे मगर कोई जाहिरी जरीआ ए माश न होने के बावजूद इनके इयालो अतफाल निहायत इत्मिनान से जिदंगी बसर करते रहे और ये अपने मौला की याद में इस कदर मुस्तगरिक रहते थे कि ये भी नहीं जानते थे कि आज कौनसा दिन है? और ये कौनसा महीना है? एक दफा ईद के दिन आप के घर में बहुत से मेहमान जमा हो गये। इत्तिफाक से उस रोज आप के घर में खाने के लिए कुछ नहीं था। आप बाला खाने पर जाकर यादे इलाही में मश्गूल हो गये। और अपने दिल में ये कहते थे कि या अल्लाह! आज ईद का दिन है और मेरे बच्चे और मेहमान भूखे हैं। इस तरह दिल ही दिल में ये कह रहे थे कि अचानक कहीं से एक शख्स छत पर आ गया और उसने खानों से भरा हुआ एक ख्वानपेश किया। और कहा कि ऐ नजीबुद्दीन! तुम्हारे तवक्कुल की धूम मलाओ अअ़ला में मची हुई है और तुम्हारा ये हाल है कि तुम ऐसे यानी खाना तलब करने के लिए ख्याल में मशगूल हो? आप ने फरमाया कि हक तआला खूब जानता है कि मैंने अपनी जात के लिए यह ख्याल नहीं किया, बल्कि अपने मेहमानों के लिए इस ख्याल की तरफ मुतवज्जेह हो गया था।

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