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नागपंचमी 11 अगस्त को परंपरागत रूप से आस्था व श्रद्धा के साथ मनाई जाएगी। श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागपंचमी पर्व मनाया जाता है। इस पर्व पर नाग देवता का श्रद्धा पूर्वक पूजन-अर्चन किया जाता है।
यह बातें ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र ने कही। उन्होंने कहा कि नागों का उद्गम महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी कदू्र से माना गया है। नागों का मूल स्थान पाताललोक प्रसिद्ध है। पुराणों में नागलोक की राजधानी के रूप में भोगवतीपुरी विख्यात है। संस्कृत कथा साहित्य में विशेष रूप से कथासरित्सागर, गरुण पुराण, भविष्य पुराण, चरकसंहिता, सुश्रुत संहिता, भावप्रकाश आदि ग्रंथों में नाग संबंधी विविध विषयों का उल्लेख मिलता है। पुराणों में यक्ष, किन्नर व गन्धर्वों के वर्णन के साथ नागों का भी वर्णन मिलता है। भगवान विष्णु की शय्या की शोभा नागराज शेष बढ़ाते हैं। भगवान शिव व गणेशजी के अलंकरण में भी नागों की महत्वपूर्ण भूमिका है। योग सिद्धि के लिए जो कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत की जाती है, उसे भी सर्पिणी कहा गया है। पुराणों में भगवान सूर्य के रथ में द्वादश नागों का उल्लेख मिलता है जो क्रमश: प्रत्येक मास में उनके रथ के वाहक बनते हैं। इस प्रकार अन्य देवताओं ने भी नागों को धारण किया है। नागदेवता भारतीय संस्कृति में देवरूप में स्वीकार किए गए हैं। कश्मीर के जाने-माने कवि कल्हण ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘रजतरंगिणी’ में कश्मीर की संपूर्ण भूमि को नागों का अवदान माना गया है। वहां के प्रसिद्ध नगर अनंतनाग नाम इसका ऐतिहासिक प्रमाण है। देश के पर्वतीय प्रदेशों में नागपूजा बहुतायत से होती है। देश के प्रत्येक ग्राम-नगर में ग्राम देवता या लोकदेवता के रूप में नागदेवता के पूजा स्थल हैं। भारतीय संस्कृति में सायं-प्रात: भगवत्स्मरण के साथ वासुकी आदि पवित्र नागों का भी स्मरण किया जाता है, जिससे नाग विष व भय से रक्षा होती है तथा सर्वत्र विजय होती है। देवी भागवत पुराण में प्रमुख नागों का नित्य स्मरण किया गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने नागोपासना में अनेक व्रत पूजन का विधान किया है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी नागों को अत्यंत आनंद देने वाली है। कहा जाता है कि एक बार मातृ शाप से नागलोक जलने लगा। इस दाह पीड़ा से निवृत्ति के लिए ‘नागपंचमी को’ गोदुग्ध स्नान जहां नागों को शीतलता प्रदान करता है वहीं भक्तों को सर्वभय से मुक्ति भी प्रदान करता है। नागपंचमी की कथा के श्रवण का भी बड़ा महत्व है। इस कथा के प्रवक्ता सुमन्त मुनि थे तथा श्रोता पाण्डव वंश के राजा शतानीक थे। कथा इस प्रकार है-
एक बार देवताओं तथा असुरों ने समुद्र मंथन द्वारा चौदह रत्नों में उच्चै:श्रवा नामक अश्व प्राप्त किया। यह अश्व रत्न अत्यंत श्वेत वर्ण का था। उसे देखकर नागमाता कद्रू तथा विमाता विनता दोनों में विवाद छिड़ गया। कदू्र ने कहा कि अश्व के केश श्याम वर्ण के हैं, यदि मैं अपने वचन में असत्य सिद्ध होऊं तो मैं तुम्हारी दासी बनूंगी अन्यथा तुम मेरी दासी बनोगी। कद्रू ने नागों को बाल के समान सूक्ष्म बनाकर अश्व के शरीर में आवेष्टित होने का निर्देश दिया, किन्तु नागों ने अपनी असमर्थता प्रकट की। इस पर कद्रू ने कु्रद्ध होकर नागों को शाप दिया कि पाण्डव वंश के राजा जन्मेजय नागयज्ञ करेंगे, उस यज्ञ में तुम सब जलकर भस्म हो जाओगे। नागमाता कदू्र के शाप से भयभीत नागों ने वासुकि के नेतृत्व में ब्रह्माजी से शाप निवृत्ति का उपाय पूछा तो ब्रह्माजी ने निर्देश दिया- यायावर वंश में उत्पन्न तपस्वी जरत्कारू तुम्हारे बहनोई होंगे। उनका पुत्र आस्तीक तुम्हारी रक्षा करेगा। ब्रह्माजी ने पंचमी तिथि को नागों को यह वरदान दिया था तथा इसी तिथि पर आस्तीक मुनि ने नागों की रक्षा की। तभी से नागपंचमी पर्व मनाया जाता है।

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