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रमजानुल मुबारक की बरकतों के क्या कहने । यूं तो इसकी हर घड़ी रहमत भरी है और हर साअत अपने जिलौ में बे पायां रहमते लिए हुए है। मगर इस माहे मुहतरम में शबे कद्र सब से ज्यादा अहमियत की हामिल है। इस की फजीलत कौन नहीं जानता । इसे पाने के लिए हमारे नबी ने रमजान पाक का पूरा महीना एतिकाफ फरमाया है और आखिरी दस दिन तो आप ने कभी तर्क नहीं फरमाए। आखिरी अशरे का एतिकाफ सुन्नत है। हदीस में है कि नबी ने फरमाया कि यकुम रमजान से बीस रमजान तक एतिकाफ करने के बाद इरशाद फरमाया कि मैंने शबे कद्र की तलाश के लिए रमजान के पहले अशरह का एतिकाफ किया फिर दरमियानी अशरह का एतिकाफ किया, फिर मुझे बताया गया कि शबे कद्र आखिरी अशरह में है। लिहाजा तुम में से जो शख्स मेरे साथ एतिकाफ करना चाहे वो करले। बहरहाल सुन्नतों दीवानों अगर कोई खास मजबूरी न हो तो माहे रमजान के आखिरी अशरह के एतिकाफ की सआदत हरगिज नहीं छोड़नी चाहिए। कम अज कम जिन्दगी में एक बार तो हर इस्लामी भाई को रमजान के आखिरी अशरह का एतिकाफ करना ही चाहिए। हदीस में है कि एतिकाफ करने वाले को हज व उमरा का सवाब मिलता हैं। रमजानुल मुबारक के आखिरी अशरह का एअ्तिकाफ सुन्नतुल मुअक्कदा अलल किफाया है। यानि पूरे शहर में किसी एक ने कर लिया तो सब की तरफ से अदा हो गया। और अगर किसी एक ने भी न किया तो सभी मुजरिम हुए। इस एअ्तिकाफ में ये जरूरी है कि रमजानुल मुबारक की बीसवीं तारीख गुरूबे आफताब से पहले पहले मस्जिद के अन्दर ब निय्यते एअतिकाफ मौजूद हो और उनतीसवीं के चांद के बाद या तीस के गुरूबे आफताब के बाद मस्जिद से बाहर निकलें।
मोहम्मद आज़म, सहायक अध्यापक मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया, इमामबाड़ा दीवान बाजार, गोरखपुर

keyword: islam, id, ramajan

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