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खुशी के दिन यानी रोजे ईद में नबी ने हमें गुरूबा मसाकीन का खयाल रखने की भी तअलीम दी। और गरीबों यतीमों और मिसकीनो को इस खुशी में शरीक करने के लिए सदक-ए-फित्र का हुक्म दिया। ताकि वो नादार अफराद जो अपनी नादारी के बाइस इस रोजे सईद की खुशी नहीं मना सकते। वो भी खुशी मना सकें। हदीस में है कि नबी ने फरमाया कि सदक-ए-फित्र वाजिब हैं। हदीस में आया है कि नबी फरमाते हैं कि फुजूल और बेहूदा कलाम से रोजों की तहारत यानी सफाई हो जाये इसलिए सदकाए फित्र वाजिब किया। साथ ही मसाकीन की खूरिश यानि खाना भी हो जाय। जब तक सदकए फित्र अदा नहीं किया जाता बन्दे का रोजा जमीन व आसमान के दरमियान मुअल्लक रहता है। सदकए फित्र हर उस मुसलमान मर्द औरत पर वाजिब है जो साहिबे निसाब हों और उनकी निसाब हाजाते असलिया याानि जरूरियते जिन्दगी से फारिग है। जिसके पास साढ़े सात तोला सोना या साढ़े बावन तोला चांदी या साढ़े बावन तौला चांदी की रकम हो और ये सब हाजाते असलिया से फारिग हो उसको साहिबे निसाब कहा जाता है। सदकाएफित्र वाजिब होने के लिए आकिल बालिग होना शर्त नहीं । बल्कि बच्चा या मजनून यानि पागल भी अगर साहिबे निसाब हो तो उनके माल में से उनका वली यानी सरपरस्त अदा करें। मालिक निसाब मर्द पर अपनी तरफ से अपने छोटे बच्चों की तरफ से और अगर कोई मजनून यानी पागल अवलाद है चाहे फिर वो पागल अवलाद बालिग ही क्यों न हो। तो उसकी तरफ से भी सदकए फित्र अदा कर दें। मर्द साहिबे निसाब पर अपनी बीवी या मां बाप या छोटे भाई बहन और दीगर रिश्तेदारों का फित्रा वाजिब नहीं। वालिद न हो तो दादा जान वालिद साहिब की जगह हैं। यानी अपने फकीर यतीम पोते पोतियों की तरफ से उन पर सदकए फित्र देना वाजिब है। मां पर अपने छोटे बच्चों की तरफ से सदकएफित्र वाजिब नहीं । बाप पर अपनी आकिल बालिग अवलाद का फित्रा वाजिब नहीं। ईदुल फित्र की सुब्हे सादिक तुलूअ होते वक्त तो साहिबे निसाब था उसी पर सदक ए फित्र वाजिब है। अगर सुबह सादिक के बाद साहिबे निसाब हुआ तो अब वाजिब नहीं। एक सौ पछत्तर रूपए अठन्नी भर यानी दो सेर तीन छटॉंक आधा तोला या दो किलो और तकरीबन पचास गिराम वजन गेहूं या उसका आटा या इतने गेहूं की कीमत एक सदक ए फित्र की मिकदार है।
मोहम्मद आज़म, सहायक अध्यापक मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया, इमामबाड़ा दीवान बाजार, गोरखपुर

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  1. Mushkil urdu shabdon ke arth bhi please ek glossary mein daal diya karein. :)

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