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मनुष्य के जीवन में जितना महत्व उसके शरीर का है, उतना ही सूर्य, चंद्र आदि ग्रहों अथवा आसपास के वातावरण का है। जागे हुए लोगों ने कहा है कि इस जगत में अथवा ब्रह्माण्ड में दो नहीं हैं। यदि एक ही है, यदि हम भौतिक अर्थों में भी लें तो इसका अर्थ हुआ कि पंच तत्वों से ही सभी निर्मित है। वही जिन पंचतत्वों से हमारा शरीर निर्मित हुआ है, उन्हीं पंचतत्वों से सूर्य, चंद्र आदि ग्रह भी निर्मित हुए हैं। यदि उनपर कोई हलचल होती है तो निश्चित रूप से हमारे शरीर पर भी उसका प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि तत्व तो एक ही है। 'दो नहीं हैंÓ का आध्यात्मिक अर्थ लें तो सबमें वहीं व्याप्त है, वह सूर्य, चंद्र हों, मनुष्य हो, पशु-पक्षी, वनस्पतियां, नदी, पहाड़ कुछ भी हो, गहरे में सब एक ही हैं। एक हैं तो कहीं भी कुछ होगा वह सबको प्रभावित करेगा। इस आधार पर भी ग्रहों का प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है। यह अनायास नहीं है कि मनुष्य के समस्त कार्य ज्योतिष के द्वारा चलते हैं। दिन, सप्ताह, पक्ष, मास, अयन, ऋतु, वर्ष एवं उत्सव तिथि का परिज्ञान के लिए ज्योतिष शास्त्र को केन्द्र में रखा गया है। मानव समाज को इसका ज्ञान आवश्यक है। धार्मिक उत्सव, सामाजिक त्योहार, महापुरुषों के जन्म दिन, अपनी प्राचीन गौरव गाथा का इतिहास, प्रभृति, किसी भी बात का ठीक-ठीक पता लगा लेने में समर्थ है यह शास्त्र। इसका ज्ञान हमारी परंपरा, हमारे जीवन व व्यवहार में समाहित है। शिक्षित और सभ्य समाज की तो बात ही क्या, अनपढ़ और भारतीय कृषक भी व्यवहारोपयोगी ज्योतिष ज्ञान से परिपूर्ण हैं। वह भलीभांति जानते हैं कि किस नक्षत्र में वर्षा अच्छी होती है, अत: बीज कब बोना चाहिए जिससे फसल अच्छी हो। यदि कृषक ज्योतिष शास्त्र के तत्वों को न जानता तो उसका अधिकांश फल निष्फल जाता। कुछ महानुभाव यह तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं कि आज के वैज्ञानिक युग में कृषि शास्त्र के मर्मज्ञ असमय ही आवश्यकतानुसार वर्षा का आयोजन या निवारण कर कृषि कर्म को संपन्न कर लेते हैं या कर सकते हैं। इस दशा में कृषक के लिए ज्योतिष ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। परन्तु उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज का विज्ञान भी प्राचीन ज्योतिष शास्त्र का ही शिष्य है। ज्योतिष शास्त्र के तत्वों से पूर्णतया परिचित हुए बिना विज्ञान भी असमय वर्षा का आयोजन या निवारण नहीं कर सकता। वैज्ञानिक प्रकृति के रहस्यों को ज्ञात कर जब चंद्रमा जलचर नक्षत्रों का भोग करता है तभी वृष्टि का आयोजन कर सकते हैं। वाराही संहिता में भी ऐसे सिद्धान्त आए हैं जिनके द्वारा जलचर चान्द्र नक्षत्रों के दिनों में वर्षा का आयोजन किया जा सकता है। प्राचीन मंत्र शास्त्र में जो वृष्टि के आयोजन व निवारण की प्रक्रिया बताई गई है उसमें जलचर नक्षत्रों को आलोडि़त करने का विधान है। सारांश यह कि वैज्ञानिक जलचर नक्षत्रों के तत्वों को जानकर जलचर नक्षत्रों के दिनों में उन तत्वों का संयोजन कर असमय ही वृष्टि कार्य संपन्न कर लेते हैं। इसी प्रकार वृष्टि का निवारण जलचर चंद्रमा के जलीय परमाणुओं के विघटन द्वारा संपन्न किया जा सकता है। प्राचीन ज्योतिष के अन्यतम अंग संहिता शास्त्र में इस प्रकार की चर्चा भी आई है। एक प्राचीन गं्रथ भद्रभाहु संहिता के शुक्राचार अध्याय में शुक्र की गति के अध्ययन द्वारा वृष्टि का निवारण किया गया है। अतएव यह मानना पड़ेगा कि ज्योतिष तत्वों की जानकारी के बिना कृषि कर्म सम्यक्तया संपन्न नहीं किया जा सकता।
जहाज के कप्तान को ज्योतिष की नित्य आवश्यकता होती है। क्योंकि वे ज्योतिष के द्वारा ही समुद्र में जहाज की स्थिति का पता लगाते हैं। घड़ी के अभाव में सूर्य, चंद्र व नक्षत्र पिंडों को देखकर आसानी से समय का पता लगाया जा सकता है। ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान के अभाव में लम्बी यात्रा तय करना निरापद नहीं, क्योंकि अक्षांश - देशांतर के द्वारा ही उस स्थान की स्थिति और उसकी दिशा आदि का निर्णय किया जाता है। जहां की सीमा पैमाइश द्वारा निश्चित नहीं की जा सकती, वहां ज्योतिष के द्वारा प्रतिपादित अक्षांश और देशांतर के आधार पर सीमाएं निश्चित की गई हैं। भूगोल का ज्ञान भी इस शास्त्र के ज्ञान के बिना अधूरा होगा। अन्वेषण कार्य को संपन्न करना है तो वह भी ज्योतिष के ज्ञान के बिना संभव नहीं है। आज तक जितने भी नवीन अन्वेषक हुए हैं वे या तो स्वतंत्र ज्योतिषी होते थे अथवा अपने साथ किसी ज्योतिषी को रखते थे। जहां आधुनिक वैज्ञानिक यंत्र कार्य नहीं करते हैं, अधिक गर्मी या अधिक सर्दी के कारण उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है, वहां सूर्य, चंद्रादि नक्षत्रों के ज्ञान द्वारा देश का बोध सरलता पूर्वक किया जा सकता है। यदि कहा जाय कि पहाड़ की ऊंचाई व नदी की गहराई का ज्ञान रेखा गणित द्वारा किया जाता है तो यह जानें कि रेखा गणित भी ज्योतिष का अभिन्न अंग है। प्राचीन ज्योतिर्विदों ने रेखा गणित के मुख्य सिद्धान्तों का निरूपण ईशवी सन 5वीं व 6वीं शताब्दी में कर दिया था।
इतिहास को भी ज्योतिष ने बड़ी सहायता पहुंचाई है। किसी घटना की तिथि का पता अन्य साधनों द्वारा नहीं लग सकता, जबकि ज्योतिष द्वारा सहज में लगाया जा सकता है। यदि ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान नहीं होता तो वेद की प्राचीनता कदापि सिद्ध नहीं होती। लोकमान्य तिलक ने वेदों में प्रतिपादित नक्षत्र, अयन और ऋतु आदि के आधार पर ही वेदों का समय निर्धारित किया है। सूर्य और चंद्र ग्रहणों के आधार पर अनेक प्राचीन ऐतिहासिक तिथियां क्रमबद्ध की जा सकती हैं। भूगर्भ से प्राप्त विभिन्न वस्तुओं का काल ज्योतिष शास्त्र के द्वारा जितनी सरलता और प्रामाणिकता के साथ निश्चित किया जा सकता है, उतना अन्य शास्त्रों के द्वारा नहीं। पुरातत्वविद गौरीशंकर हरिश्चंद्र ओझा ने बताया है कि पुरातत्व की वस्तुओं के यथार्थ समय को जानने के लिए ज्योतिष ज्ञान की आवश्यकता है।
सृष्टि के रहस्य का पता भी ज्योतिष से ही लगता है। प्राचीन काल से ही भारतवर्ष में सृष्टि के रहस्य की छानबीन करने के लिए ज्योतिष शास्त्र का उपयोग किया जा रहा है। इसी कारण सिद्धान्त ज्योतिष के ग्रंथों में सृष्टि का विवेचन रहता है। प्रकृति के अणु-अणु का रहस्य ज्योतिष ग्रंथों में बताया गया है, जिससे प्रत्येक व्यक्ति सृष्टि के रहस्य को ज्ञात कर अपने कार्यों का संपादन करे। जड़-चेतन सभी पदार्थों की आयु, आकार-प्रकार, उपयोगिता एवं भेद-प्रभेद का जितना सुन्दर विज्ञानसम्मत कथन ज्योतिष शास्त्र में है, उतना अन्य ग्रंथों में नहीं।
इतना ही नहीं ज्योतिष विज्ञान के बिना औषधियों का निर्माण यथासमय संपन्न नहीं किया जा सकता है। कारण स्पष्ट है कि ग्रहों के तत्व और स्वभाव को जानकर उन्हीं के अनुसार उसी तत्व और स्वभाव वाली दवा विशेष गुणकारी होती है। जो इस शास्त्र के ज्ञान से अपरिचित रहते हैं वे सुन्दर व अपूर्व गुणकारी दवाओं का निर्माण नहीं कर सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र के द्वारा रोगी की चेष्टा को अवगत कर रोग के बारे में जाना जा सकता है। संवेग रंगशाला नामक ज्योतिष ग्रंथ में रोगी का रोग जानने के अनेक नियमों पर चर्चा की गई है। अत: जो चिकित्सक ज्योतिष तत्वों को जानकर चिकित्सा कार्य को संपन्न करता है, वह अपने इस कार्य में ज्यादा सफल रहता है। साधारण व्यक्ति भी ज्योतिष शास्त्र के सम्यक ज्ञान से अनेक रोगों से बच सकता है। क्योंकि अधिकांश रोग सूर्य और चंद्रमा के विशेष प्रभावों से उत्पन्न होते हैं। फायलेरिया रोग चंद्रमा के प्रभाव के कारण ही एकादशी व अमावस्या को बढ़ता है। ज्योतिर्विदों का कथन है कि जिस प्रकार चंद्रमा समुद्र के जल में उथल-पुथल मचा सकता है, उसी प्रकार शरीर के रुधिर प्रवाह में भी अपना प्रभाव डालकर निर्बल मनुष्यों को रोगी बना देता है। अतएव ज्योतिष द्वारा चंद्रमा के तत्वों को अवगत कर एकादशी और अमावस्या को वैसे तत्वों वाले पदार्थों के सेवन से बचने पर फायलेरिया रोग से छुटकारा मिल सकता है। इस प्रकार निर्बल मनुष्य रोगों के आक्रमण से अपनी रक्षा कर सकता है।
ज्योतिष शास्त्र की सबसे बड़ी उपादेयता यही है कि वह समस्त मानव जीवन के प्रत्येक प्रत्यक्ष और परोक्ष रहस्यों का विवेचन करता है और प्रतीकों द्वारा समस्त जीवन को प्रत्यक्ष रूप में उस प्रकार प्रकट करता है जिस प्रकार दीपक अंधकार में रखी हुई वस्तु को दिखलाता है। मानव का कोई भी व्यावहारिक कार्य इस शास्त्र के ज्ञान के बिना नहीं चल सकता है।
गजाधर द्विवेदी, गोरखपुर

keyword: jyotish

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  1. जानकारीपरक, हर विषय का अपना योगदान है हमारे जीवन में,

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  2. gajadhar ji
    my dob 24.06.1951 evening 7.30 PM makar lagna Brish raashi. Although many told me that my writing career would be very successful it is not even 10% of it. People hardly read my write ups except very serious readers who appreciate. Can you tell me the reason Astrologically?

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  3. मैं एक व्यक्ति को जानता हूँ जो डाक्टर होने के साथ साथ एक ज्योतिषी भी है | मैंने स्वयं उसके ज्ञान को परखा है | परन्तु जो भी हो यदि ज्योतिष को चिकित्सा के रूप में स्वीकार किया जाए तो चिकित्सा और भी प्रभावशाली हो सकती है |

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  4. समुद्र में आने वाला ज्वार भाटा चन्द्रमा की कलाओं के अनुसार घटता बढ़ता है |

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gajadhardwivedi@gmail.com

 
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