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वर्ष में संपूर्ण सूर्य की 12 संक्रांतियों में से छह में विवाह आदि कार्य नहीं किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त यदि शुभ ग्रह शुक्र व बृहस्पति भी सूर्य के अत्यंत सन्निकट रहता है, अर्थात अस्त अवस्था में रहता है तो भी विवाह आदि मांगलिक कार्य स्थगित कर दिए जाते हैं। इसके लिए त्रिबल शुद्धि की भी आवश्यकता है। त्रिबल शुद्धि में सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति की दीप्ति अवस्था और राशिगत शुद्धि देखी जाती है। मेष, वृष, मिथुन, वृश्चिक, मकर और कुंभ की संक्रांतियां ग्राह्य और अन्य संक्रांतियां अग्राह्य हैं। यदि महीनों में देखा जाय तो वैशाख, ज्येष्ठ, अषाढ़, अगहन, माघ व फाल्गुन इसके लिए प्रशस्त माने गए हैं। यदि इसके पूर्व या पश्चात के महीने हों और उपरोक्त शुभ संक्रांतियां हों तो भी विवाह होते हैं। अषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तक भगवान विष्णु का शयन रहता है, इस दौरान भी विवाहादि मांगलिक कार्य नहीं होते हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी को देवोत्थान एकादशी कहते हैं, इस एकादशी के बाद विवाहादि मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है। इसके बाद भी दो खरमास पड़ते हैं जिसमें विवाहादि कार्य रुक जाते हैं।
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विवाह मुहूर्त
देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान के जगने के साथ ही सभी मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं। ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र के अनुसार विवाह मुहूर्त-
नवम्बर- 18, 19, 20, 25, 27, 28, 30।
दिसम्बर- 3, 4, 5, 10, 11 तथा 6, 12 व 14 को दिवा लग्न। 16 दिसम्बर से 14 जनवरी तक खरमास।
जनवरी- 18, 20, 21, 22, 23, 25, 27 तथा 19, 24, 26 व 28 को दिवा लग्न।
फरवरी- 3, 4, 8, 9, 10, 16, 17, 18, 20, 22, 24 तथा 14 को दिवा लग्न।
मार्च- 2, 3, 7, 8, 14 तथा 4 व 9 को दिवा लग्न। 14 मार्च की रात 1.5 बजे खरमास लग जाएगा।

आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी, आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर



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