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वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध जयंती के रूप मे मनाया जाता है। बौद्ध लोग इसे धार्मिक पर्व की तरह मनाते हैं। गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म के प्रवर्तक थे और इनका जन्म 568 ईसा पूर्व तथा मृत्यु 483 ईशा पूर्व मानी जाती है। 14 मई को बैशाख पूर्णिमा है। गौतम बुद्ध विश्व के महानतम व्यक्तियों में से एक हैं। हिन्दू धर्म में बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। बौद्ध धर्म की नींव मानवता का मार्ग ढूढऩे के लिए त्याग और साधना पर आधारित है। इनका जन्म कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्य वंश के राजा थे तथा माता महामाया देवी थीं जो जन्म के समय ही स्वर्ग सिधार गईं। गौतम बुद्ध का जन्म का नाम सिद्धार्थ था। बचपन में इनके संबंध में एक ऋषि ने उनके पिता से कहा था कि या तो यह एक महान राजा बनेगा अथवा एक महान साधु। इस भविष्यवाणी के कारण ही शुद्धोधन ने अपनी सामथ्र्य की हद तक सिद्धार्थ को दुख से दूर रखा। फिर भी 29 वर्ष की उम्र में उनकी दृष्टि चार दृश्यों पर पड़ी- बूढ़ा अपाहिज आदमी, एक बीमार आदमी, एक लाश और एक साधु। इन चारों दृश्यों को देखकर सिद्धार्थ समझ गए कि सबका जन्म होता है, बीमारी आती है और एक दिन मृत्यु हो जाती है। उन्होंने इस प्रकार अपना समृद्ध जीवन, अपनी जाति, अपनी पत्नी, अपना पुत्र छोड़कर साधु का जीवन अपना लिया ताकि वे जन्म, बुढ़ापे, दर्द, बीमारी और मृत्यु का उत्तर खोज पाएं। सिद्धार्थ ने पांच ब्राह्मणों के साथ सत्य की खोज शुरू की जिसमें उन्हें कठोर तपस्या, भूख और शारीरिक यंत्रणा झेलनी पड़ी। कठोर तपस्या छोड़कर आखिरकार उन्होंने आर्य अष्टांग मार्ग ढूढ़ा जो बीच का मार्ग कहलाता है। यह मार्ग कठोर तपस्या और असंयम की पराकाष्ठा के बीच है। एक ब्राह्मणी से खीर लेकर शरीर की ऊर्जा बढ़ा और वे पीपल वृक्ष के नीचे जिसे बोधि वृक्ष कहते हैं, सत्य जानने की प्रतिज्ञा कर बैठ गए। संपूर्ण रात बैठने के बाद प्रात: उन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया और अपना पहला धर्मोपदेश वाराणसी के निकट सारनाथ में अपने मित्रों को दिया। मित्रों को बोध कराकर उन्हें प्रचार के लिए भेज दिया।
बुद्ध उपदेशों का सार : सम्यक ज्ञान धम्म कहलाता है। धम्म में छह बातें बतलाई गई हैं- जीवन को पवित्र बनाए रखना, जीवन में पूर्णता प्राप्त करना, निर्वाण प्राप्त करना, तृष्णा का त्याग और यह मानना कि सभी अनित्य है और कर्म को मानव के नैतिक संस्थान का आधार मानना। बुद्ध के अधम्म में पराप्रकृति में विश्वास, ईश्वर में विश्वास करना, आत्मा में विश्वास करना, यज्ञ में विश्वास करना, धर्म की पुस्तकों का वाचन मात्र और धर्म की पुस्तकों को त्रुटियों से परे मानना इत्यादि शामिल है। धम्म का पालन व अधम्म का परित्याग ही बौद्ध धर्म का सार है।
बुद्ध के अनुसार सधम्म के भी तीन मुख्य बिंदु बताए गए हैं।
1- जो धम्म प्रजा की वृद्धि करे और सबके लिए ज्ञान का द्वारा खोले और बताए कि विद्वान होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि आवश्यकता प्रज्ञा प्राप्त करने की है।
2- जो धम्म मैत्री की वृद्धि करे, जो धम्म बताए कि प्रज्ञा के साथ शील भी अनिवार्य है और करुणा से अधिक मैत्री की आवश्यकता है।
3- वह जब सभी प्रकार के भेदभाव मिटा दे यानी मनुष्य और मनुष्य के मध्यम सभी दीवारों को गिरा उनका मूल्यांकन जन्म से नहीं बल्कि कर्म से करे, साथ ही समानता के भाव की वृद्धि करे।
यही नहीं गौतम बुद्ध ने तत्कालीन रूढिय़ों और अंधविश्वासों का खंडन कर एक सहज मानव धर्म की स्थापना की। उनके अनुसार जीवन में संयम, सत्य और अहिंसा का पालन करते हुए पवित्र और सरल जीवन व्यतीत करना चाहिए। उनकी मुख्य शिक्षाओं कर्म, भाव और ज्ञान के साथ सम्यक की साधना को जोडऩा था, क्योंकि कोई भी अति शांति नहीं दे सकती। इसी तरह मनुष्य को पीड़ा व मृत्यु के भय से मुक्ति मिल सकती है, इसी मुक्ति व शांति को उन्होंने निर्वाण कहा है। इनके धर्म का प्रभाव भारत के बाहर चतुर्दिक फैला। यही वजह है कि बुद्ध पूर्णिमा के दिन को इस महान विभूति का स्मरण कर एक पर्व व उत्सव के रूप में ज्ञान की एक नई दिशा मानकर मनाते हैं। लुम्बिनी जो दक्षिण मध्य नेपाल में है, सम्राट अशोक ने वहां तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व बुद्ध के जन्म की स्मृति में एक स्तंभ बनवाया जो आज भी है और हजारों श्रद्धालु इस वहां आते हैं और अपना श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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