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इसी माहे मुबीन में वह मुबारक रात होती है।
खुदाई की अता जिस रात में खैरात होती है।
मुबारक रात ले कर आज पैगामे निजात आई।
नवेद ऐ उम्मते सुलताने बत्हा शब बरात आई।
समझ में इस शबे मसउद की बाबतने बात आई।
इबादत के लियेजो सब से बेहतर है वह रात आई।
इसी शब में खुदा तकसीमें रिज्क व उप्र करता है।
मशिययत आज ले कर दफतरे मौत व हयात आई।
उठो मर्दाने शब बेदार मशगूले इबादत हो।
मुबारक शबे बारात आई मुबारक शबे बरात आई।

दुनिया-ए- इस्लाम में साल का हर महीना किसी न किसी खसूसियत का अपने अंदर समेटे हुये है। हर महीना अपने खासियत के लिहाज से मुसलमानों के नजदीक एक खास मकाम रखता है। शअ्बानुल मुअज्जम के महीने की हदीसों में बड़ी फजीलत आई है। इस माह की पन्द्रहवीं तारीख को बेहद अहम रात आती है। जिसे शब-ए-बरात के नाम से जाना जाता है। शब का मतलब रात होता है। बरात का मतलब जागना। जिसमें साल भर के तमाम काम बांटे जाते है। कौन पैदा होगा, कौन मरेगा, किसे कितनी रोजी मिलेगी। सब इस दिन बांटा जाता है। 13 जून को यह मुबारक रात आ रही है। इस दिन शहर की छोटी से लेकर बड़ी मस्जिदों, घरों में लोग इबादत करते है। खुदा से दुआं मांगते है। कब्रिस्तान पर जाकर फातिहा पढ़ते है। पूर्वजों को याद करते है। पूर्वजों के नाम से गरीबों को खाना खिलाते है। इस दिन घरों में तमाम तरह के हलुआ व लजीज व्यंजन बनाया जाता है। देर रात तक लोग नफिल नमाज व तिलावत कर अपना मुकद्दर सवारने की दुआयें मांगते है। अगले दिन रोजा रखकर इबादत करते है। इसके पन्द्रह दिन बाद रमजान माह की आमद हो जाती है। एक तरह से रमजान के रोजों की तैयारी भी हो जाती है। हम आपको दीन की रोशनी में बता रहे है कि आप क्या करें कि इस रात का फायदा आपको हासिल हो जाये।
यह करना चाहिए :-
इस मुबारक रात में गुस्ल करना। अच्छे कपडे पहनना वास्ते इबादत के सुरमा लगाना, मिस्वाक करना, इत्र लगाना, कब्रों की जियारत करना, फातेहा दिलाना, खैरात करना, मुर्दों की मगफिरत की दुआ करना, बीमार की अयादत करना, तहज्जुद की नमाज पढना, नफिल नमाजें ज्यादा पढना, दरूद व सलाम की कसरत करना, खसूसन सूर यासीन शरीफ की तिलावत करना, आमाले सालेह में ज्यादती करना, इबादत में सुस्ती ने करना बेहतर है।
जो नहीं करना चाहिएः-
ऐसी मुबारक व मुकद्दस रात की कदर न करना, इबादत में सुस्ती व काहिली करना, सिनेमा देखना, चाये खानों में रात गुजार देना, आतिशबाजी खुद जलाना या बच्चों को इसकी आदत डालना, रात फिजूल काम और गप शप में गुजार देना, बदकारी करना, लोगों को सताना, गीबत और चुगली में वक्त जाए करना, रात तमाम सोतेे रहना वगैरह ये तमाम बातें खुदा और उस के रसूल की नाराज करती है। इससे बचना चाहिए।
नफिल नमाज शब-ए-बरात:-
मगिरब की नमाज के बाद गुस्ल करके दो रकअत नमाज तहियतुल वुजू पढ़े इसके बाद आठ रकअत नमाज नफिल चार सलाम से अदा करें। हर रकअत में बाद अलहम्द के सूरः अखलास पांच बार पढे़ तो गुनाहों से पाक होगा। दुआयें कुबूल होंगी और सवाबे अजीम हासिल होगा।
चार रकअत नफिल एक सलाम से पढ़े। हर रकअत में बाद अलहम्दु के सूर अखलास पचास बार पढे़ तो इस तरह गुनाहों से बाहर आयेगा जैसा कि मां के पेट से निकला था।
दो रकअत नमाज पढ़ंे। हर रकअत में बाद अलहम्दु के बाद आयतल कुर्सी एक बार और सूर अखलास पन्द्रह बार, बाद सलाम के दरूद शरीफ एक सौ बार पढे तो रिज्क में वसअत होगी। गम व अलम से निजात मिलेगी। गुनाहों की बखिशश व मगफिरत होगी।
चौदह रकअत नमाज नफिल सात सलाम के अदा करे। हर रकअत में बाद अलहम्दु के जो सूर चाहे पढे, बाद फराग नमाज के एक सौ मर्तबा दरूद शरीफ पढ कर जो भी दुआ मांगे कुबूल होगी।
सलहाये उम्मत का दस्तूर है कि इस रात को सलातुल तस्बीह अदा करते है। पैगम्बर साहब ने ये नमाज अपने चचा हजरत अब्बास को सिखायी थी और फरमाया था कि ऐ चचा! इस नमाज के पढ़ने से अगले पिछले दानिस्ता व नादानिस्ता तमाम गुनाह बख्श दिये जाते है दूसरी हदीस में ऐसा आया है कि ऐ मेरे चचा अगर तुम्हारे गुनाह कफे दरया व रेगे बयाबां से भी ज्यादा होंगे तो इस नमाज की बरकत से बख्श दिये जायेंगे।
इस रात में तीन मर्तबा सूर यासीन की तिलावत करनी चाहिए।
हजरत शेख अबूल कासिम सफा से मन्कूल है कि एक रोज हजरत फातिमतुज्जौहारा रजियल्लाहु को ख्वाब में देखा। बाद सलाम के मैं ने अर्ज किया ऐ खातूने जन्नत आप किस चीज को ज्यादा दोस्त रखती हैं कि रूह मुबारक को बख्शंू। फरमाया पैगम्बर साहबन कि देास्त रखती हूं शअ्बान के महीने में आठ रकअत देा सलाम चार कअ्दह के साथ और हर रकअ्त में बाद अलहम्दु के सूर अखलास ग्यारह बार पढे। जो कोई ये नमाज माहे शअ्बान में पढे और मुझे इस का सवाब बखशे तो ऐ अबुलकासिम मैं हर गिज कदम न रखूंगी जन्नत में जब तक कि उस की शफाअत न कराऊं। अकसर सलहा यह नमाज पन्द्रहवीं शअ्बान को अदा फरमाते है।
मुबारक दिन:-

माह शअ्बानुल मुअज्जम की पन्द्रहवीें तारीख को रोजा रखने की आहादीस में सख्त ताकीद की गयी है।
फजाइले शब-ए- बरात:-
हजरत अबूबकर से फरमाया पैगम्बर साहब ने कि उठो ऐ लोगों, शअ्बान की रात। पन्दहरवीं रात शअ्बान की निहायत बुजुर्ग है। जो शख्स इस रात को इबादत करता है उसे बेहद सवाब मिलता है। पैगम्बर साहब ने फरमाया कि बुजुर्ग जानो इस शब-ए-बरात को, कि वह पन्द्रहवीं शब शअ्बान की है, उतरते हैं इस में फरिश्ते रहमत क,े नाजिल होती है रहमतें इलाही उन लोगों पर जो इबादत करते है इस रात को। वह ऐसी रात है कि बुजुर्ग किया इस को अल्लाह तआला ने। जो इबादत करता है उस रात में अल्लाह तआला उसके सारे गुनाह माफ फरमा देता है। वह शख्स पाक हो जाता है तमाम गुनाहों से। फरमाया रसूल ने कि जो जिन्दा रखे पन्द्रहवीं शब माहे शअ्बान को तो जिन्दा रखता है अल्लाह तआला उसको कयामत तक यानी मौत के बाद भी सवाब अता करेगा। हर रोज इबादत का सवाब उसके नाम-ए-आमाल में जुड़ता है। फरमाया पैगम्बर साहब नेे कि अल्लाह तआला पन्द्रहवीं शअ्बान को तमाम आबिदों और सालिहों और सिद्दकों और नेकों और बुरों को बख्शता है।
मगर जादूगरों, नजूमियों, बखीलों और मां बाप को तकलीफ देने वालों, शराब खोरों और जानियों को नहीं बखश्ता। हां जो लोग तोबा कर लें वह बख्शे जायेंगे।
और वारिद है कि खुदा तआला फरमाता है पन्द्रहवीं रात शअ्बान को कि है कोई बखशिश चाहने वाला मुझ से कि मैं बख्श दूं, है कोई जो आफियत चाहे मुझ से कि मैं उस के सेहत दूं और है कोई फकीर जो गिना चाहे कि मैं उस को गनी कर दूं।
इरशाद फरमाया पैगम्बर साहब ने कि जिब्राईल मेेरे पास आये और कहा, उठो या रसूलल्लाह नमाज पढो और दुआ मांगो अपनी उम्मत के लिये इस रात को मगर मुश्रिक, जादूगर, बखील और शराबी, सूदखोर ओर जानी के लिये बखशिश ने मांगों क्यों कि अल्लाह तआला उन पर अजाब करने वाले है, हां मगर जो तोबा करे तो। यानि खुशखबरी है वास्ते उस आदमी के कि अमल करे नेक पन्द्रहवीं शबे शअबान में । (ब हवाला फजाइल शहूर व सियाम)।
साल भर के तमाम काम बांटे जाते है:-
खुदा फरमाता है कि हमारे हुक्म से इस रात में हर हिक्मत वाला काम बांट दिया जाता है। यानी शब-ब-बरात में साल में होने वाले हर अहम काम को बांट दिया जाता है। जिंदगी से लेकर मौत तक। जुमला अहकाम, रिज्क, आजाल और तमाम साल के हवादिस तकसीम कर दिये जाते है और काम के फरिश्तों को उन की तामील पर लगा दिया जाता है। पैगम्बर साहब ने हजरत आयशा से फरमाया तुम जानती हो इस रात में क्या होता है। उन्होंने अर्ज किया या रसूल क्या होता है फरमाया इस रात में साल का हर पैदा होने वाला और हर मरने वाला आदमी लिखा जाता है और उन के रिज्क उतारे जाते है। (बहीकी शरीफ)
रहमतें इलाही का उतरना:-
पैगम्बर साहब ने फरमाया कि अल्लाह शब-ए-बरात में मेरी उम्मत पर बनी कल्ब की बकरियों के बालों के बराबर रहमतें नाजिल फरमाता है। (तफसीर कबीरा)। बनी कल्ब अरब में एक कबीला था, उन के यहां बकरियां कसरत से थी।
मुसलमानों की मगफिरत :-
पैगम्बर साहब ने फरमाया कि हक तआला इस रात में तमाम मुसलमानों की मगफिरत फरमा देता है। सिवाये मुश्रिक, काफिर, जादूगर, नजूमी, जानी, शराबी, सूदखोर, मां बाप की ना फरमानी करने वाले और रिश्ता तोड़ने वाले के।
इबादत की फजीलत:-
पैगम्बर साहब ने इरशाद फरमाया कि जो शख्स इस रात में सौ रकअत नफिल नमाज पढ़ेगा रब उसे के पास सौ फरिश्ते भेजेगा। तीस जन्नत की खुशखबरी सुनायेंगे। तीस दोजख के अजाब से दूर रखेंगे। तीस दुनिया की आफतें दूर करेंगे, दस शैतान के मक्कारियों से बचायेंगे।
हजरत अली से मरवी है कि हुजूर ने फरमाया शब-ए-बरात आये तो रात में कियाम करो यानी नमाज पढो और दिन में रोजा रखों। नबी ने फरमाया कि अल्लाह इस शब में गुरूबे आफताब के वक्त आसमान से दुनिया की तरफ नजूल करता है और इरशाद फरमाता है कि क्या है कोई मगिफरत चाहने वाला कि मैं उस की मगिफरत करूं, क्या है कोई रोजी मांगने वाला कि मैं उस को रोजी दूं, क्या है कोई गिरµतारी बला कि मैं उसे आफियत दूं, क्या है कोई और ऐसा, इस किस्म की आवाज सुबह तक होती है।


हदीस शरीफः-
फरमाया पैगम्बर मोहम्मद साहब ने कि शअ्बान मेरा महीना है। इस की फजीलत तमाम महीनों पर ऐसी है जैसी मेरी फजीलत तमाम जीवधारियों पर।
दूसरी हदीस में आया है कि शअ्बानुल मुअज्जम की बुजुर्गी बाकी महीनों पर ऐसी है जैसे तमाम पैगम्बरों पर मुझे फजीलत दी गयी है। मालूम हो कि जिस तरह रसूल सब पैगम्बरों से अफजल है। उसी तरह आप का महीना भी सब महीनों से अफजल है। शअ्बान में अल्लाह तआला अपने बंदों को खैर व बरकत कसरत से इनायत फरमाता है बंदों को भी लाजिम है कि वह कसरत से इबादत करें।
हजरतें आयशा रजियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि पैगम्बर साहब पूरा महीना रोजे रखा करते थे। माहे शअ्बानुल मुअज्जम एक उम्दा और मुबारक महीना ह,ै जिसको पैगम्बर साहब नेे महबूब रखा है। ये वह महीना है कि इस में गुनाहों की माफी होती है।
मो: आजम, सहायक अध्‍यापक मदरसा दारूल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार गोरखपुर

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