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शहर-ए-काजी गोरखपुर मुफ्ती मौलाना वलीउल्लाह ने कहा कि तरावीह की नमाज अल्लाह ने मुसलमानों को ईनाम के तौर पर दिया है। हर मुसलमान के ऊपर रोजे फर्ज किए गए हैं। चांद की पुष्टि होने के बाद सभी मुसलमान तैयार होकर रात की नमाज में आ जाते हैं। रोजाना की नमाज के बाद रमजान के महीने की एक और नमाज होती है -तरावीह। यह बीस रकात के साथ पढ़ी जाती है। इस नमाज में इमाम पूरे कुरआन को बगैर देखे हुए नमाज में खड़े होकर पढ़ता है और उसके पीछे खड़े होने वाले हजारों मुसलमान उसे सुनते हैं। नमाज खत्म होने के बाद तब और नमाजें पूरी करके अपने घर जाते हैं। थोड़ा-बहुत खाकर कुछ देर आराम करते हैं। फिर सूर्योदय से तकरीबन ढाई-तीन घंटा पूर्व उठकर थोड़ा सा नाश्ता करते हैं, जिसे सेहरी कहते हैं। इसके बाद पूरे दिन सूर्य डूबने तक हर किस्म की खाने-पीने की चीजें बंद हो जाती हैं। इस महीने के अंदर रोजेदार को भूख-प्यास का बहुत एहसास हो जाता है और वह गरीबों की भूख का भी ख्याल करके पूरी हमदर्दी करता है। रोजा इफ्तार कराना, गरीबों को खाना खिलाना आमतौर से हर मुसलमान करता है। साल की कमाई के बचत का चालीसवां हिस्सा गरीबों व यतीमों में खर्च करता है।

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