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यह व्रत भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष षष्ठी के दिन किया जाता है जो 16 अगस्त 2014 को है। यह स्त्रियों का व्रत है। इस दिन हिंसा से बचना चाहिए, चींटी आदि छोटे जीवों के मार्ग का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। दोपहर के समय पलाश, कुश के नीचे शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय व गणेश की मूर्ति स्थापित कर भक्ति भाव से पूजन करें। इस दिन सांवा या तिन्नी के चावल का भोजन किया जाता है।
व्रत महात्म्य
जिस समय अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में स्थित शिशु अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से खंडित हो रहा था, उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने उसे हलषष्ठी व्रत करने की आज्ञा दी। उत्तरा ने इस व्रत को किया और इसके प्रभाव से उसका गर्भस्थ शिशु जीवित हो गया।
विशेष
इस दिन जुते हुए भूमि में पैदा हुआ अन्न न चढ़ाया जाता है और न ही खाया जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश व पश्चिमी बिहार का यह प्रचलित व्रत है जिसे स्त्रियां बड़ी श्रद्धा के साथ रहती हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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