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अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक जो मां का पवित्र काल है उसे शारदीय नवरात्र कहते हैं। इसमें नौ तिथियों का व्रत किया जाता है। ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र के अनुसार जो लोग नौ दिन व्रत नहीं रह सकते वे सप्तमी, अष्टमी व नवमी इन तीन तिथियों में व्रत करें तो उनकी कामना सिद्ध हो जाती है। भविष्य पुराण के अनुसार एक समय भोजन करके या रात्रि में भोजन करके या बिना मांगें जो मिल जाए उसी को ग्रहण कर मां भगवती की पूजा प्रसन्नता पूर्वक भक्ति भाव के साथ करना चाहिए।
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कलश स्थापन मुहूर्त
इस बार शारदीय नवरात्र व्रत 25 सितंबर दिन गुरुवार से प्रारंभ होकर 2 अक्टूबर दिन गुरुवार तक मात्र आठ दिनों का है। 25 सितंबर को प्रतिपदा तिथि दिन में 12 बजकर 26 मिनट तक है, हस्त नक्षत्र सायंकाल 7 बजकर 49 मिनट तक है। मारकंडेय पुराण के अनुसार द्वितीया तिथि युक्त प्रतिपदा कलश स्थापन के लिए श्रेष्ठ व उत्तम है। इसलिए इस दिन (25 सितंबर) सूर्योदय 6 बजकर 1 मिनट से दोपहर 12 बजकर 26 मिनट तक कलश स्थापन किया जाएगा।
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अष्टमी, नवमी व दशहरा
1 अक्टूबर को सप्तमी युक्त अष्टमी होने से यह व्रत के लिए ग्राह्य नहीं है। 2 अक्टूबर को नवमी युक्त अष्टमी को व्रत रहा जाएगा। जो लोग नवरात्र के प्रथम दिन व अष्टमी को व्रत रहते हैं, वे इसी दिन व्रत रहेंगे। इसी दिन नवमी व्रत भी रहा जाएगा क्योंकि 2 अक्टूबर को प्रात: 8.30 बजे तक अष्टमी तिथि है इसके बाद संपूर्ण दिन व रात्रिपर्यंत नवमी तिथि है। 3 अक्टूबर को नवमी प्रात: 6.24 बजे तक ही है जो सूर्योदय से मात्र 18 मिनट बाद तक है। इसलिए 2 अक्टूबर को ही कन्यापूजन, हवन व नवमी व्रत किया जाएगा। हवन 2 अक्टूबर को प्रात: 8.30 बजे से 3 अक्टूबर को प्रात: 6.24 बजे तक किया जा सकता है। इसके बाद दशमी तिथि लग जाएगी। 3 अक्टूबर को दशहरा धूमधाम से मनाया जाएगा।

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