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उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दीपावली पर्व कम से कम तीन हजार साल पुराना है। किंतु उस समय इसका स्वरूप आज से बिल्कुल भिन्न था। अज हम इसे धन की देवी लक्ष्मी के पूजन पर्व के रूप में मनाते हैं जबकि प्राचीन काल में यह यक्षों का ही पर्व माना जाता था। इस रात्रि को यक्ष जाति के लोग अपने सम्राट कुबेर के साथ विलास में बिताते और अपनी यक्षिणियों के साथ आमोद-प्रमोद करते थे। सर्वत्र हर्षोल्लास व प्रेमोन्माद की वर्षा होती थी। इसलिए इस रात्रि को यक्ष रात्रि कहा जाता था। वराह पुराण व वात्स्यायन के कामसूत्र में भी इसका उल्लेख यक्ष रात्रि के रूप में किया गया है। कालांतर में इस अवसर पर यक्षाधिपति कुबेर के पूजन की परंपरा शुरू हुई। उत्तरी भारत के अनेक गांवों में यक्ष वृक्ष, यक्ष चौरा के प्रमाण आज भी मिलते हैं। इसका वर्तमान रूप डीह बाबा और जाख-जाखिनी की पूजा के रूप में आज भी गांवों में प्रचलित है। पर्वतीय जातियों में अब भी यक्ष पूजा की परंपरा है।
विभिन्न स्थानों पर की गई खुदाई में कुषाण काल की अनेक प्रतिमाएं मिली हैं जिसमें यक्षपति कुबेर और लक्ष्मी को एक साथ दिखाया गया है। कुछ प्रतिमाओं में कुबेर को अपनी पत्नी इरिति के साथ दिखाया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में कुबेर और उनकी पत्नी इरिति का ही पूजन किया जाता रहा होगा। कालांतर में इरिति का स्थान लक्ष्मी ने ले लिया और आगे चलकर कुबेर के स्थान पर गणेशजी को प्रतिष्ठित कर दिया गया। कुछ स्थानों पर आज भी गणेश-लक्ष्मी के साथ कुबेर व इंद्र की पूजा की जाती है।
यक्ष रात्रि के साथ लक्ष्मी के जुडऩे का कारण धन की देवी तथा इसी दिन विष्णु से उनके विवाह का होना है। देखा जाय तो कुबेर व लक्ष्मी की प्रकृति में समानता अधिक है। कुबेर धन के देवता हैं और लक्ष्मी धन की देवी हैं। अंतर केवल यह है कि कुबेर की मान्यता यक्ष जाति में थी और लक्ष्मी की देव व मानव जाति में। कालांतर में जब हमारे यहां विभिन्न जातियों व संस्कृतियों का समन्वय हुआ तो आपस में एक-दूसरे की मान्यताओं को स्वीकार करना स्वाभाविक था। इसलिए कुबेर और लक्ष्मी को एक ही रूप मानकार उनकी पूजा की जाने लगी। प्रारंभ में देव जाति के मुख्य देवता वरुण थे। उसके बाद वैवस्वत मनु ने मानव संस्कृति को जन्म दिया तो इंद्र व अन्य देवताओं को भी पूज्य माना गया। सांस्कृतिक प्रवाह में जब शैव संप्रदाय का महत्व समाज में बढऩे लगा तो गणेशजी की प्रतिष्ठा बढ़ी। गणेशजी ऋद्धि-सिद्धि के देवता माने जाते हैं जबकि कुबेर केवल धन के ही अधिपति हैं। लक्ष्मी जी केवल धन की नहीं, यश, सुख व कृषि आदि की देवी हैं, इसलिए लक्ष्मी के साथ गणेश की निकटता मानी जाने लगी। मत्स्यपुराण के अनुसार स्वयं कुबेर ही वाराणसी में आकर अपने यक्ष स्वभाव को छोड़कर भगवान शिव के गणनायक और मंगल मूर्ति गणेश बन गए। गणेश जी के गनानन स्वरूप को छोड़ दिया जाय तो उनकी शेष आकृति कुबेर से काफी मिलती है। वही लम्बोदर और स्थूल शरीर गणेश जी का भी है और कुबेर का भी।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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