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7 अक्टूबर को सूर्योदय 6.10 बजे और चतुर्दशी तिथि का मान सायंकाल 6.41 बजे तक है। इसके बाद पूर्णिमा है। 8 अक्टूबर को पूर्णिमा तो है लेकिन रात्रि में पूर्णिमा का अभाव है, इसलिए शरदपूर्णिमा का व्रत 7 अक्टूबर को ही रहा जाएगा। इसे कौमुदी पूर्णिमा कहते हैं। इसी रात भगवान श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था, इसलिए इस रात को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
शरदपूर्णिमा की रात में चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं के साथ उदित होकर अपनी किरणों से अमृत वर्षा करते हैं, वहीं माता लक्ष्मी संसार में भ्रमण करती हुई भगवत भजन कर रहे भक्तों को धन और संपूर्ण वैभव प्रदान करती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत व विधिवत पूजन-अर्चन करने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है और अभीष्ट की प्राप्ति होती है। घर का अभाव दूर होता है और समृद्धि का निवास होता है।
ऐसे मनाएं शरदपूर्णिमा
इस दिन देश के अधिकतर हिस्सों में तांबे अथवा मिट्टी के कलश पर माता लक्ष्मी अथवा इष्टदेव की प्रतिमा स्थापित कर सुंदर वस्त्राभूषणों से उनका श्रृंगार कर, उपवास का संकल्प लेकर षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है। इसके बाद चंद्रमा के उदय होने पर घी के 108 दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं। तत्पश्चात घी मिश्रित दूध की खीर बनाकर उसे विभिन्न पात्रों में भरकर चंद्रमा की चांदनी में रखा जाता है। रात्रि में तीन घंटे बीतने पर सारी खीर लक्ष्मी जी को अर्पित की जाती है। पुन: भगवान के भजन के साथ रात्रि जागरण किया जाता है। कहीं-कहीं रात्रि जागरण से पूर्व ब्राह्म्णों को खीर की प्रसाद से युक्त भोजन करवाया जाता है तो कहीं संपूर्ण रात्रि चांदनी में खीर रखने के पश्चात प्रात:काल उसे वितरित किया जाता है। चंद्रमा की अमृत वर्षा से खीर अमृतमयी हो जाती है जो आरोग्य का कारक होती है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

keyword: sharad purnima

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  1. Very informative.For the first time we got so meaningful information.

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  2. Informative! Thank you Gajadhar:)

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