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जब माहे रमजान की पहली रात आती है तो आसामनों और जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते है और आखिरी रात तक बंद नहीं होते। जो कोई बंदा इस माहे मुबारक की किसी भी रात में नमाज पढता है तो अल्लाह उसके हर सज्दे के एवज यानी बदले में उसके लिए सतरह सौ नेकियां लिखता है ओर उसके लिए जन्नत में सूर्ख याकूत का घर बनाता है। जिस में सत्तर हजार दरवाजे होंगे। और हर दरवाजे के दोनों पट सोने के बने होंगे। जिन में याकूते सूर्ख जडे़ होंगे। पस जो कोई माह रमजान का पहला रोजा रखता है तो अल्लाह महीने क महीने के अािखरी दिन तक उसके गुनाह माफ फरमा देता है और दूसरे रमजान तक उसे कफ्फारा हो जाता है। और हर वो दिन जिस में ये रोजा रखेगा और उस ही रोजे के बदले में उसे एक हजार सोने के दरवाजे वाला महल जन्नत में अता होगा और उसके लिए सुबह से शाम तक सत्तर हजार फरिश्तें दुआ-ए-मगफिरत करते रहेेंगे। रात और दिन में जब भी वो सज्दा करेगा उस हर सज्दे के इवज यानी बदले उसे जन्नत में एक ऐसा दरख्त अता किया जाएगा कि अगर उसके नीचे एक घोड़ा सवार सौ बरस तक भी चले तो फिर भी उस एक दरख्त के दूसरे सिरे तक न पहुंच सके।
फरहान
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