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रोजा एलाने नबुव्वत के पन्द्रहवें साल दस शव्वाल दो हिजरी (10.10.2 हिजरी) में फर्ज हुआ। रब तआला ने कुरआन शरीफ में फरमाया ऐ ईमान वालों तुम पर रोजे फर्ज किये गये जैसे कि अगलों पर फर्ज हुये कि तुम्हें परहेजगारी मिले।
रोजा रखने के बहुत फजायल है हदीस शरीफ में है रब तआला फरमाता है रोजा मेरा है और मैं ही उसकी जजा हूं यानी रोजदार मुझको पा लेता है। रोजा से शहवत टूटती है और गफलत दूर होती है। इसलिए बंदा रब का करीबी हो जाता है।
हदीस शरीफ में है कि रमजान और कुरआन रोजादार की शफाअत करेंगे। रोजादार जन्नत में रैय्यान नाम के दरवाजे से दाखिल होगा। रोजा रखने में बहुत सी हिकमतें है रोजा रखने से भूक और प्यस की तकलीफ का पता चलता है जिससे गिजा और पानी की कदर मालूम होती है और इंसान खुदा का शुक्र अदा करता है। रोजा से भूखों और प्यासों पर मेहरबानी का जज्बा पैदा होता है क्योंकि मालदार अपनी भूक याद करके गरीब मोहताज की भूख का पता लगाता है। रोजा से भूख के बर्दाश्त करने की आदत पड़ती है। अगर कभी खना मयस्सर न हो तो घबराता नहीं और अल्लाह की नाशुक्री नहीं करता। भूख बहुत सी बीमारियों का इलाज है।
डाक्टर तबीब बतातें है कि फाका यानी खाली पेट रहना बहुत सी बीमारियों का इलाज है क्योंकि इससे कूव्वतें हाजमा की इस्लाह होती है। रोजा ब्लड प्रेशर, कैंसर, फालिज, मोटापा, चमडे़ की बीमारियों और भी बहुत सारी बीमारियों में फायदा बख्श है जैसा की चिकित्सकों ने रिर्सच किया है। रोजा सिर्फ इंसान ही की इबादत है। फरिश्तें और दीगर मख्लूक इसमें शामिल नहीं और रोजा रखने की सबसे बड़ी हिकमत यह है कि इससे परेहजगारी मिलती है जैसा कि रब का फरमान है। इसलिए तमाम मुसलमानों को चाहिए कि रब का शुक्र अदा करते हुए खुश दिली से रोजा रखें और रब के इनाम के मुस्तहिक बनें।
(रोजा के मुताल्लिक किसी तरह के सवाल जवाब के लिए मौलाना मुफ्ती अख्तर हुसैन अजहरी मन्नानी के मोबाइल नम्बर 9956971232 पर सम्पर्क कर सकते है)

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  1. बहुत बढ़िया जानकारी प्रस्तुति हेतु धन्यवाद!

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