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विधि- सुखासन, पद्मासन, सिद्धासन में से किसी एक आसन में सुख पूर्वक बैठकर दोनों नासिकाओं से पूरा श्वांस अंदर गहराई तक भरें व सहजता से दोनों नासिकाओं से पूरा निष्कासित कर दें। श्वांसों के साथ लयबद्धता हो और बिना किसी तनाव के प्रसन्नता पूर्वक करें।
भाव- जब श्वांस अंदर भरें तो ऐसा भाव करना है कि वातावरण में जो दिव्य शक्तियां हैं, पवित्रता है, निरोगता है, आनंद है, वह प्राण वायु के माध्यम से मेरे रोम-रोम में समाहित हो रही है। मैं तोजोमय, कांतिमय, आभामय हो रहा हूं, जब श्वांस बाहर फेंके तो ऐसा भाव करें कि मेरे रोग बाहर निकल रहे हैं, मेरे दोष बाहर निकल रहे हैं, मेरे दुर्गुण बाहर निकल रहे हैं, मेरा क्रोध बाहर निकल रहा है।
लाभ- सर्दी, जुकाम, एलर्जी, श्वांस, दमा, फेफड़ों से संबंधित सभी रोग व कफ रोग दूर होते हैं। फेफड़े सफल बनते हैं।
-द्वारा पतंजलि योग समिति, गोरखपुर

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