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कम से कम तीन बार अधिकतम 5 से 10 बार साथ ही अग्निसार की क्रिया भी 3-5 बार करें।
विधि- श्वांस को भीतर भरें फिर पूरी शक्ति के साथ बाहर फेंककर पेट को पीठ की ओर खींचे (उड्डीयान बंध) नाभि के नीचे के भाग, गुदा भाग, मूतेदिं्रय को ऊपर की ओर खींचे (मूलबंध), अब टुड्डी को नीचे झुकाते हुए कंठ कूप में लगावें (जालंधर बंध)।
जब श्वांस बाहर फेंके तब भाव करें कि मेरे काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईष्र्या एवं द्वेष आदि विकार बाहर निकल रहे हैं। विचार शक्ति जितनी प्रबल होगी समस्त कष्ट उतनी ही प्रबलता से दूर होंगे।
लाभ- मन की चंचलता दूर होगी। मंदाग्नि सहज ही जठराग्नि में परिवर्तित हो जाएगी। उदर रोग, बवासीर, गुदा भ्रंश, योनिभ्रंश, फिश फिस्टुला एवं यौन रोगों में लाभ होता है। वीर्य की उध्र्वगति होने से ब्रह्मचर्य व्रत पालन करने में सहायता मिलती है।
द्वारा पतंजलि योग समिति, गोरखपुर

Keywords: yoga

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