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विक्रम संवत 2072 में आषाढ़ मास अधिक मास है। जिस चांद्र मास में सूर्य संक्रांति नहीं होती उसे अधिक मास कहते हैं। अधिक मास दो महीने वाला होता है। एक शुद्ध मास और दूसरा मलमास। पूर्णिमांत पद्धति में प्रथम मास का कृष्ण पक्ष और द्वितीय मास का शुक्ल पक्ष शुद्ध मास होता है। इस प्रकार इस वर्ष प्रथम आषाढ़ का कृष्ण पक्ष एवं द्वितीय आषाढ़ का शुक्ल पक्ष शुद्ध मास के रूप में होगा, वहीं प्रथम आषाढ़ का शुक्ल पक्ष व द्वितीय आषाढ़ का कृष्ण पक्ष मलमास या अधिक मास के रूप में होगा। अधिक मास में जन्मतिथि, मरणतिथि, श्राद्ध, व्रत, उपवास, स्नान, संस्कार इत्यादि शुभ कार्य के संबंध में धर्मशास्त्रीय एवं मुहूर्तशास्त्रीय जो व्यवस्था है उसका विवरण इस प्रकार है-
जन्मतिथि और अधिक मास- यदि किसी व्यक्ति का जन्म अधिक मास के अंतर्गत होता है तो उसकी जन्मतिथि उसी माह में मानी जाती है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति का जन्म प्रथम आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को हुआ तो आगामी वर्षों में उसकी जन्मतिथि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मानी जाएगी।
नित्य श्राद्ध- अमावस्या, युगादि मन्वादि श्राद्ध इत्यादि नित्य श्राद्ध शुद्ध एवं मलमास दोनों ही मासों में किए जाते हैं।
मासिक श्राद्ध - व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत प्रथम वर्ष में किए जाने वाले मासिक श्राद्धों के मध्य यदि अधिक मास आ जाए जो शुद्ध एवं मलमास दोनों ही मासों में श्राद्ध किया जाए। ऐसी स्थिति में एक श्राद्ध की वृद्धि हो जाती है।
अन्य श्राद्ध- तीर्थ श्राद्ध, प्रेतश्राद्ध, अलभ्य योग के श्राद्ध, दैनिक श्राद्ध इत्यादि के लिए मलमास की वर्जना नहीं है परन्तु महालय श्राद्ध, अष्टका श्राद्ध आदि केवल शुद्ध मास में ही किए जा सकते हैं।
व्रत, उपवास एवं स्नान- अधिक मास में व्रत या उपवास का आरंभ अर्थात प्रथम बार करना निषिद्ध है। इसका प्रारंभ शुद्ध मास में ही करना चाहिए। पूर्व में आरंभ किए गए नित्य प्रकृति के व्रत एवं उपवास शुद्ध एवं मलमास दोनों ही मासों में किए जाते हैं। नैमित्तिक व्रत एवं उपवास शुद्ध मास में किए जाते हैं। मासिक स्नान शुद्ध एवं मलमास दोनों में किए जाते हैं। व्रत का उद्यापन, वेदव्रत, चातुर्मास्य का आरंभ इत्यादि केवल शुद्ध मास में ही किए जा सकते हैं।
संस्कार एवं अधिक मास- जिन संस्कारों को एक निश्चित अवधि या समय पर किया जाना आवश्यक होता है वे मलमास में किए जा सकते हैं। गर्भाधान संस्कार, पुंसवन संस्कार, सीमांत संस्कार, जातकर्म संस्कार, अन्नप्राशन संस्कार व अंतिम संस्कार।
शुभ कर्म एवं अधिक मास- गृहारंभ, गृहप्रवेश, प्रथम बार वधू प्रवेश, देवी प्रतिष्ठा, विष्णु शयन, गया तथा गोदावरी को छोड़कर अन्य किसी क्षेत्र की प्रथम बार तीर्थयात्रा, यज्ञ, 16 महारानों में कोई दान, राज्याभिषेक इत्यादि केवल शुद्ध मास में ही किए जा सकते हैं।
मलमास के निषिद्ध कर्म- अग्न्याधान, देवप्रतिष्ठा, यज्ञ, सोलह महारानों में कोई भी दान, तुला पुरुष दान, गजदान, कन्यादान, नए व्रत का आरंभ, वेदव्रत, वृषोत्सर्ग, चूड़ाकर्म, उपनयन, पहली बार तीर्थयात्रा, विवाह, राज्याभिषेक, यान निर्माण, कार्यारंभ व भवन, वाहन आदि का क्रम आदि मलमास में निषिद्ध हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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