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सेहरी सुबह के नाश्तें को कहते है जो सुबह सादिक होने से पहले रोजेदार खाते है। हाफिज अयाज अहमद ने दीनी किताबों के हवाले से बताया कि पैगम्बर मोहम्मद साहब ने फरमाया कि सहरी खाया करो। क्योंकि सेहरी में बरकत है। अल्लाह तआला और उसके फरिश्तें सहरी खाने वालों पर रहमत नाजिल फरमाते है। पैगम्बर साहब जब अपने किसी साथी को सहरी खाने के लिए बुलाते तो इरशाद फरमाते आओ बरकत का खाना खा लो। सहरी हमारे लिए एक अजीम नेअमत है। जिससे बेशुमार जिस्मानी और रूहानी फवाइद हासिल होते है। इसी लिए आप ने इसे मुबारक नाश्ता कहा है। हदीस में है कि सहरी खाया करो क्योंकि सहरी खाने से हर लुक्में के बदले साठ बरस की इबादत का सवाब मिलता है।
हजरत शेख शर्फुद्दीन अल मअरूफ बाबा बुलबुल शाह के बारे में लिखा है कि आप ने फरमाया है अल्लाह तआला ने मुझे रहमत से इतनी ताकत बख्शी है कि मैं बगैर खाए पिए और बगैर साजों सामान के अपनी जिंदगी गुजार सकता हूं। मगर चूंकि पैगम्बर मोहम्मद साहब की सुन्नत है सेहरी खाना इसलिए मेरे नजदीक एक सुन्नत की पैरवी हजार साल की इबादत से बेहतर है। शुरूआत में रात को उठकर सेहरी करने की इजाजत नहीं थी। रोजा रखने वाले को गुरूबे आफतब सूर्य अस्त के बाद सिर्फ उस वक्त तक खाने, पीने की इजाजत थी जब तक वो सो न जाए। अगर सो गया तो अब जागने पर खाना पीना मना था। मगर अल्लाह ने अपने प्यारे बंदों पर अहसान अजीम फरमाते हुए सहरी की इजाजत मरहमत फरमा दी और इसका सबब यूं हुआ जैसा कि कंजुल ईमान शरीफ की शरह में हजरते सदरूल अफाजिल मौलाना नईमुद्दीन मुरादाबादी नक्ल करते है वह फरमाते है कि हजरत सरमा बिन कैस मेहनती शख्स थे। एक दिन बहालते रोजा अपनी जमीन में दिन भर काम करके शाम को घर आए। अपनी पत्नी से खाना तलब किया। वो पकाने में जुट गयी। आप थक चुके थे। आंख लग गई। खाना तैयार करके जब आप को जगाया गया तो आप ने खाने से इंकार कर दिया। क्योंकि उन दिनों सूर्य अस्त के बाद सो जाने वाले के लिए खाना पीना मना हो जाता था। चुनांचे खाए पिए बगै आप ने दूसरे दिन भी रोजा रख लिया। आप कमजोरी के सबब बेहोश हो गए तो इनके हक में कुरआन में आयत नाजिल हुई। जिसका तर्जुमा है और खाओ और पियो यहां तक कि तुम्हारे लिए जाहिर हो जाए सफेदी का डोरा स्याही के डोरे से पौ फट कर। फिर रात आने तक रोजे पूरे करो। इस आयत से रात का काले डोरे से और सुबह सादिक को सफेद डोरे से तशबीह दी गई। यानि तुम्हारे लिए रमजानुल मुबारक की रातों में खाना पीना जायज करार दे दिया गया है। इससे ये भी मालूम हुआ कि रोजे का अजाने फज्र से कोई तअल्लुक नहीं यानी फज्र की अजान के दौरान खाने पीने की इजाजत नहीं है। अजान हो या न हो। आप तक आवाज पहंुचे या न पहुंचे सुबह सादिक होते ही आप खाना पीना बिल्कुल ही बंद करना होगा। किसी को ये गलत फहमी न हो जाए कि सहरी रोजे के लिए शर्त है। ऐसा नहंीं है। सहरी के बगैर भी रोजा हो सकता है। मगर जानबूझकर सहरी न करना ये मुनासिब है कि ये एक अजीम सुन्नत से महरूमी है और ये भी याद रहे कि सहरी में खूब डटकर खाना ही जरूरी नहीं। चंद खजूरें और पानी ही अगर ब नियते सहरी इस्तेमाल कर लें जब भी सुन्नत काफी है।
-हाफिज अयाज अहमद

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