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खुुदा की छोटी बड़ी बहुत सी किताबें नाजिल (उतारी गयी) हुई। बड़ी किताब को किताब और छोटी को सहीफह कहते है। उनमें चार किताबें बहुत मशहूर है अव्वल तौरेत जो हजरते मूसा अलैहिस्सलाम पर नाजिल हुई। दूसरी जबूर जो हजरत दाऊद अलैहिस्सलाम पर नाजिल हुई। तीसरी इन्जील जो हजरते ईसा अलैहिस्सलाम पर नाजिल हुई। चैथी कुरआन मजीद जो पैगम्बर मोहम्मद साहब पर नाजिल हुुई। पूरा कुरआन मजीद एक दफा इकट्ठा नहीं नाजिल हुआ बल्कि जरूरत के मुताबिक 23 वर्षों में थोड़ा-थोड़ा नाजिल हुआ। कुरआन मजीद की हर सूरत पर ईमान लाना जरूरी है अगर एक आयत का भी इंकार कर दे या यह कहे कि कुरआन जैसा नाजिल हुआ था अब वैसा नहीं है, बल्कि घटा बढ़ा दिया गया है तो वह काफिर है।
मौलाना मुफ्ती अख्तर हुसैन ने बताया कि कुरआन शरीफ सबसे अफजल किताब है। और यह किताब सबसे अफजल रसूल, नबियों के सरदार पैगम्बर मोहम्मद साहब पर उतरी। तौरात, जबूर, इन्जील, कुरआन अल्लाह के कलाम हैं और अल्लाह के कलाम में किसी का किसी से अफजल होने का हरगिज यह मतलब नहीं कि अल्लाह का कोई कलाम घटिया हो क्योंकि अल्लाह एक है उसका कलाम एक है। उसे कलाम में घटिया बढि़या की कोई गुंजाइश नहीं अलबत्ता मुसलमानों के लिए कुरआन शरीफ में सवाब ज्यादा है। सब आसमानी किताबें और सहीफे हक है और सब अल्लाह ही के कलाम हैं उनमें अल्लाह तआला ने जो कुछ इरशाद फरमाया उन सब पर ईमान जरूरी है। मगर यह बात अलबत्ता हुई कि अगली किताबों की हिफाजत अल्लाह तआला ने उम्मत के सुपुर्द की थी और अगली उम्मत उन सहीफों और किताबों को याद न कर सकी इसलिए अल्लाह का कलाम जैसा उतरा था वैसा उनके हाथों में बाकी न रह सका और बल्कि उनके शरीरों ने अल्लाह के कलाम में अदल बदल कर दिया जिसे तहरीफ कहते हैं। उन्होंने अपनी ख्वाहिश के मुताबिक घटा बढ़ा दिया। इसलिए जब उन किताबों की कोई बात हमारे सामने आये तो अगर वह बात हमारी किताब के मुताबिक है तो हमको तसदीक करना चाहिए और अगर मुखालिफ है तो यकीन कर लेंगे कि उन अगली शरीर उम्मतियों की तहरीफ है।
कुरआन शरीफ के किसी एक हर्फ लफ्ज या नुक्ते को कोई बदलने की कोशिश करें तों बदलना मुमकिन नहीं। तो जो यह कहे कि कुरआन के कुछ पारे या सूरतें या आयतें या एक हर्फ भी किसी ने कम कर दिया या बढ़ा दिया या बदल दिया वह काफिर है क्यूंकि उसने ऐसा कहकर ऊपर लिखी आयत का इन्कार किया। खुदा फरमाता है बेशक हमने कुरआन उतारा और बेशक हम खुद उसके जरूर निगहबान हैं।
अगली किताबें नबियों को ही जुबानी याद होती लेकिन कुरआन मजीद का यह मोजजा है कि मुसलमानों का बच्चा बच्चा उसकों याद कर लेता है। कुरआन मजीद की सात किरातें है। मतलब यह है कि कुरआन शरीफ को सात तरीकों से पढ़ा जा सकता है और यह सातों तरीके बहुत मशहूर है। हिन्दुस्तान में आसिम की रिवायत से ही कुरआन पढ़़ा जाता है।
रमजान में न सिर्फ बन्दों पर रोजे फर्ज किये गये बल्कि अल्लाह पाक ने सारी आसमानी किताबें रमजान के महीने में उतारी। कुरआन पाक इसी माह में नाजिल हुआ जो 23 साल में थोड़ा-थेाड़ा कर मुकम्मल हुआ। इसलिए इस महीने में कुरआन को पढ़ना बेहद सवाब माना जाता है। कुरआन का बंदो पर हक है कि मुसलमान साल में एक बार कुरआन जरूर मुकम्मल पढे़। तरावीह की नमाज में एक कुरआन मुकम्मल किया जाता है। इस महीने में हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम पर सहीफे 3 तारीख को उतारे गए। हजरत दाऊद अलैहिस्सलाम को जबूर आसमानी किताब 18 या 21 रमजान को मिली और हजरत मूसा अलैहिस्सलाम को तौरेत 6 रमजान को मिली। हजरत ईसा अलैहिस्सलाम को इंजील 12 रमजान को मिली। इस माह में कुरआन शरीफ भी उतारी गयी, हजरत जिब्राईल अलैहिस्सलाम हर साल रमजान में आते और पैगम्बर साहब को कुरआन सुनाते और हमारे नबी उनको कुरआन सुनाते थे।


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