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-14 जुलाई 2015 से एक वर्ष तक सिंह राशि में रहेगा गुरु
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार विवाह में वर का सूर्य बल एवं चंद्र बल देखा जाता है। वधू के गुरु बल व चंद्र का अवलोकन होता है। सूर्य आत्मा का कारक ग्रह है। चंद्रमा मन का कारक ग्रह माना जाता है। विवाहादि शुभ एवं मांगलिक कार्यों में वर-वधू के गृहस्थ जीवन को प्रशस्त बनाने के लिए तीनों ग्रहों के शुभत्व की महत्ता है। सामान्य रूप से गुरु ग्रह का सत्वगुण राशि धनु और मीन के सूर्य में तथा सूर्य के रजोगुण राशि सिंह में गुरु का गोचर गुरुत्वादित्य दोष कहलाता है। भारतीय हिंदू पद्धति में चाहे कोई धर्म अथवा विचारधारा हो, सभी में लगभग प्रत्येक शुभ कार्यों में देवताओं की उपस्थिति अनिवार्य है। इसलिए दस महादानों में से एक कन्या दान में देवताओं की अनुपस्थिति स्वीकार नहीं हो सकती। इस कारण सिंहस्थ गुरु में शुभ कार्यों को वर्जित कहा गया है। चूंकि शुभत्व कारक गुरु ग्रह सौरमंडल के सम्राट सूर्य की राशि में होने से, सूर्य के प्रभाव में रहकर समस्त प्राणियों को अपना शुभ आशीर्वाद देने में असमर्थ होता है।
महर्षि वशिष्ठ के अनुसार जिस समय देव-दानव युद्ध हुआ था, उस समय गुरु सिंहस्थ था। यह संघर्ष गंगा व गोदावरी के मध्य हुआ था, इसलिए उनका कहना है कि सिंहस्थ गुरु का अशुभ प्रभाव प्रथम गोदावरी के उत्तर से गंगा के दक्षिण पडऩे वाले क्षेत्रों के लिए ही मान्य है, अन्य क्षेत्रों के लिए नहीं। परन्तु पराशर ऋषि सहित अन्य छह ऋषियों ने कहा है कि सिंहस्थ गुरु यदि मघा नक्षत्र भोग कर चुका है तो शेष समय में समस्त शुभ कार्य किए जा सकते हैं।
सिंहस्थ गुरु में विवाह हो या न हो, इसके लिए आचार्य एकमत नहीं हैं। वास्तव में यह देखने में आता है कि मुख्य नियम का ही अधिकतर पालन होता है। मुख्य नियम के अपवाद को समाज व्यवहार में नहीं लाता है। कुल मिलाकर सिंहस्थ गुरु में विवाह करना शास्त्रानुकूल नहीं कहा जा सकता। नारद संहिता, देवी भागवत, मुहूर्त चिंतामणि, राजमार्तण्ड, वराह मिहिर आदि के विचार से सिंहस्थ गुरु के सिंह नवमांश में विवाह आदि शुभ कार्य त्याज्य है। परन्तु जो जातक इस परिस्थिति में एक वर्ष तक प्रतीक्षा नहीं कर सकते, उनके लिए शास्त्रों में परिहार भी दिया गया है।
गुरु की शुभता के उपाय- जिन जातकों को विवाह एवं मांगलिक कार्य सिंहस्थ गुरु में करना नितांत आवश्यक हो वे गुरु की शुभता पाने के लिए निम्न उपाय कर सकते हैं।
-ईशान दिशा में श्वेत कलश की स्थापना कर उसमें पंचगव्य, कुशोदक, विष्णुक्रांता, शतावरी आदि का प्रक्षेपण करें। चौकोर पीढ़ा पर वृहस्पति की प्रतिमा स्थापित कर षोडशोपचार विधि से पूजा करें। पीला कपड़ा, पीला यज्ञोपवीत, पीला चंदन, पीला चावल, पीला पुष्प, घी का दीपक और दही-भात आदि अर्पित करें। ऊं वृं वृहस्पतये नम: का संकल्पपूर्वक 64000 जप करें। अंत में पीपल की लकड़ी, घी, मधु, मिश्री से दशांश हवन करें और ताम्रपात्र में जल भरकर वृहस्पति को अघ्र्य प्रदान करें। पुष्प लेकर प्रार्थना करें। इसके बाद प्रतिमा का विसर्जन कर दें।
-आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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