0
पिछले वर्ष 19 जून 2014 में देवगुरु वृहस्पति कर्क राशि में संचार कर रहे थे। इस वर्ष 2015 में 14 जुलाई को प्रात: 6.26 बजे गुरु ग्रह मघा नक्षत्र सिंह राशि में प्रवेश करेंगे तथा संवत के अंत तक सिंह राशि पर ही रहेंगे।
परिचय- आकार में बड़ा होने के कारण वृहस्पति को गुरु यानी भारी ग्रह कहते हैं। इसका व्यास लगभग डेढ़ लाख किलोमीटर है। यह सूर्य से 78 करोड़ किलोमीटर दूर है। यह अपनी धुरी पर 9 घंटे 55 मिनट में एक चक्कर लगा लेता है। सूर्य की परिक्रमा करने में 11 वर्ष 10 महीने लगते हैं। वृहस्पति के 14 उपग्रह हैं। यह इतना विशाल है कि सौर मंडल के सारे ग्रह इसमें समा सकते हैं। इसे एक राशि को पार करने में 13 महीने लगते हैं। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार गुरु ईशान कोण का स्वामी है। यह ब्राह्म्ण जाति, चमकदार पीले रंग का, आकाश तत्व वाला, सतोगुणी तथा पुरुष ग्रह है। यह भारी-भरकम शरीर, कफ-चर्बी का अधिपति, मीठे रस का शौकीन, उच्च शिक्षा, सदाचार, ज्ञान शास्त्र से संपन्न तथा न्याय नीति का प्रतीक है। जातक की मनोवृत्ति, धार्मिकता और संपन्नता का भी प्रतीक वृहस्पति को माना जाता है। जीवन की सुख-शांति, यश-कीर्ति और सम्मान वृहस्पति से ही आंका जाता है। यह पाक शास्त्र का ज्ञाता, चिकित्सा उपचार में निपुण, यज्ञ, अनुष्ठान और प्रवचन से उपदेश देने वाला, पुत्र व पौत्र सुख का कारक भी माना जाता है। अशुभ वृहस्पति व्यक्ति को मूर्ख, शारीरिक परिश्रम करने वाला, खराब और विकृत दांतों वाला, अप्रिय आकृति का बना देता है। यह ग्रह सप्तम स्थान के अलावा पंचम व नवम स्थान को भी पूर्ण दृष्टि से देखता है। धनु व मीन इसकी अपनी राशियां हैं। यह कर्क राशि में उच्च का और मकर राशि में नीच का हो जाता है। सांसारिक जीवन में गुरु, पुरोहित, अध्यापक, दादा, पुत्र, पौत्र और सलाहकार के रूप में वृहस्पति अपनी भूमिका का निर्वाह करता है।
-आचार्य शरद चंद्र मिश्र, 430 बी, आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

Keywords: jyotish

नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गूगल खोज से ली गई हैं, यदि किसी फोटो पर किसी को कॉपीराइट विषय पर आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगी।

Post a Comment

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top