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पांच से दस बार करें, एक बार में दस से पंद्रह सेकेंड लगते हैं। विधि- दोनों कानों के ढक्कदन को दोनों अंगूठों से ऐसा दबाकर कान बंद करें कि बाहर की आवाज सुनाई न दे। तर्जनी अंगुली माथे पर रहेगी, मध्योमा व अन्यह अंगुलियों से आंख के मूल को हल्केक से ढकें, नासिका से श्वांढस को अंदर भरें, मुंह को बंद रखते हुए नासिका से ऊं का उच्चाकरण करें, ऊं का उच्चारण करते हुए नासिका से श्वांास को बाहर छोड़ दें। यह भाव करें कि आज्ञा चक्र में भगवान दिव्य ज्योरति के रूप में प्रकट होकर मेरे समस्तछ अज्ञान दूर कर मुझे ऋतंभरा प्रज्ञा संपन्नभ बना रहे हैं। भगवान की करुणा, शांति व आनंद बरस रहा है। लाभ- स्मतरण शक्ति बढ़ती है, तनाव से मुक्ति, डिप्रेशन, उच्चा रक्तकचाप दूर होते हैं। सकारात्माक शक्ति आती है, नकारात्ममकता बाहर निकलती है।
द्वारा पतंजलि योग समिति गोरखपुर

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