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19 अगस्त बुधवार 2015 को सूर्योदय 5 बजकर 35 मिनट और पंचमी तिथि का मान 57 दंड 26 पल अर्थात अद्र्धरात्रि पश्चात रात्रिशेष 4 बजकर 33 मिनट तक है। यह शुक्ल श्रावण पंचमी है। इस दिन नाग देवता का पूजन होता है। इस दिन काष्ठ पर एक कपड़ा बिछाकर उसपर रस्सी की गांठ लगाकर सर्प का प्रतीक रूप बनाकर, उसे काले रंग से रंग दिया जाता है। कच्चा दूध, घृत और शर्करा तथा धान का लावा इत्यादि अर्पित किया जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस दिन दीवारों पर गोबर से सर्पाकार आकृति का निर्माण कर सविधि पूजन किया जाता है। प्रत्येक तिथि के स्वामी देवता हैं। पंचमी तिथि के स्वामी देवता सर्प हैं। इसलिए यह कालसर्पयोग की शांति का उत्तम दिन है।

कालसर्प जनित अनिष्ट की शांति का उत्तम दिन
इस तिथि को चंद्रमा की राशि कन्या होती है और राहु का स्वगृह कन्या राशि है। राहु के लिए प्रशस्त तिथि, नक्षत्र एव स्वगृही राशि के कारण नागपंचमी सर्पजन्य दोषों की शांति के लिए उत्तम दिन माना जाता है। कालसर्प योग की शांति विधियां अधिकांशत: नागपूजा एव श्राद्ध बलि पर आधारित हैं। पंचमी तिथि को भगवान आशुतोष भी सुस्थानगत होते हैं। इसलिए इस दिन सर्प शांति के अंतर्गत राहु-केतु का जप, दान, हवन आदि उपयुक्त होता है। इसके अतिरिक्त अन्य दुर्योगों के लिए भगवान शिव का अभिषेक, महामृत्युंजय मंत्र का जप, यज्ञ, शिव सहस्रनाम का पाठ, गाय और बकरे के दान का भी विधान है।

क्यों इसी दिन नाग देवता की होती है विशिष्ट पूजा?
श्रावण के महीने में सूर्य कर्क राशिगत मित्रगृही होता है। इस महीने का संबंध भगवान शिव से है और शिव का आभूषण सर्प देवता हैं। अत: इस तिथि पर सर्प (नाग) पूजन से नागों के साथ ही भगवान आशुतोष की भी असीम कृपा प्राप्त होती है। पुराणों में नागलोक की राजधानी के रूप में भोगवतीपुरी विख्यात संस्कृत कथा साहित्य में विशेष रूप से (कथासरित्सागर) नागलोक व वहां के निवासियों की कथाओं से ओतप्रोत है। गरुण पुराण, भविष्य पुराण, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, भावप्रकाश आदि ग्रंथों में नाग संबंधी विविध विषयों का उल्लेख मिलता है। पुराणों में यक्ष, किन्नर और गंधर्वों के साथ नागों का भी वर्णन मिलता है। भगवान विष्णु की शैय्या की शोभा नागराज शेष बढ़ाते हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्‍तमपुर,
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