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साक्षी होना शिव होने की यात्रा है। साक्षी हो गए तो शिव हो गए। साक्षीत्व ही शिवत्व है। शिव-सूत्र में भगवान शिव कहते हैं कि विस्मय योग की भूमिका है। अर्थात जीवन में जब तक विस्मय न हो, आश्चर्यबोध न हो तब तक योग में प्रवेश नहीं होता। योग में प्रवेश न हुआ तो साक्षीत्व की यात्रा कठिन हो जाएगी। योग एक बहुत ही संवेदशील मार्ग है। विस्मय बच्चों में होता है, सारे जीवन के प्रति, छोटी से छोटी बात उन्हें विस्मित कर देती है। विस्मय ही आनंद का प्रारंभ है और योग आनंद में प्रवेश की प्रक्रिया है। छोटे बच्चे स्वाभाविक योगी होते हैं। योग से शिव का अभिप्राय है सर्व से जुड़ जाने की घटना। योग का शाब्दिक अर्थ भी जोड़ ही है। जब हम सर्व से अलग-थलग होने की मानसिक दीवार तोड़ कर उससे जुड़े होने का अनुभव कर लेते हैं तो तो योगी हो जाते हैं। विस्मय से भरे हुए होने का इतना ही अर्थ है कि निष्कर्षों, निर्णयों, पूर्वाग्रहों, तुलनाओं और उधार के ज्ञान की बोझिलता से मुक्त होना। जो इस प्रकार निरंतर विस्मय विमुग्ध होता है वही योग में प्रवेश कर पाता है और सहज ही योगी हो जाता है। ओशो कहते हैं, 'शिव कोई पुरोहित नहीं हैं। शिव तीर्थंकर हैं। शिव अवतार हैं। शिव क्रांतिद्रष्टा हैं, पैगंबर हैं। वे जो भी कहेंगे, वह आग है। अगर तुम जलने को तैयार हो, तो ही उनके पास जाना। अगर तुम मिटने को तैयार हो, तो ही उनके निमंत्रण को स्वीकार करना। क्योंकि तुम मिटोगे तो ही नये का जन्म होगा। तुम्हारी राख पर ही नये जीवन की शुरुआत है।
-स्वामी आनंद असीम, ओशो संन्यासी

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