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भगवान शिव सृष्टि के उद्गम स्थल हैं। उन्हीं से सृष्टि निकलती है और अंत में उन्हीं में सृष्टि का लय हो जाता है। शिवलिंग शिव के इसी गुण का प्रतीक है। प्रकृति व पुरुष का प्रतीक शिवलिंग सृष्टि की प्रक्रिया को दर्शाता है। सृष्टि के संचालन के लिए पुरुष व प्रकृति या ब्रम्ह व माया या स्त्री व पुरुष दो का होना जरूरी है। द्वंद्व संसार का नियम है, द्वंद्व में घर्षण है और इसी से सृष्टि की उत्पत्ति व वृद्धि संभव है। पुरुष व प्रकृति सिर्फ बाहर ही नहीं, वह हमारे भीतर भी है। शिव का अद्र्धनारीश्वर रूप इसका प्रतीक है। हमारी उत्पत्ति पुरुष व प्रकृति दोनों के संयोग से हुई है, इसलिए हमारे भीतर इन दोनों के तत्व मौजूद हैं। इसलिए हमें अपने भीतर पुरुष व प्रकृति का संयोग बिठाना है। ताकि घर्षण हो और हमारी नई चेतना का आविर्भाव हो। यही चेतना हमें मूलाधार से सहस्रार तक की यात्रा कराएगी। मूलाधार अर्थात शक्ति व सहस्रार अर्थात शिव। यानी शक्ति का शिव से मिलन होगा। जब मनुष्य के भीतर शिव व शक्ति या पुरुष व प्रकृति का मिलन होता है तो मनुष्य अपने चरम विकास को पहुंचता है। ऐसे ही संपूर्ण विकसित मनुष्य को भगवान कहा जाता है। उसे बुद्ध, सत्य, धर्म, कैवल्य, निर्वाण आदि किसी भी नाम से पुकार सकते हैं। लेकिन वस्तुत: उसका कोई नाम नहीं होता। वह एक निर्विकार चैतन्य स्थिति होता है। इसलिए अपने भीतर की पुरुष व प्रकृति का संयोग बिठाना ही साधना, जप व पूजा का कुल अर्थ है।
-अवधूत छबीले राम, प्रमुख अघोर पीठ ट्रांसपोर्ट नगर, गोरखपुर

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