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कलकत्ता में मात्र 13 वर्ष की अवस्था में भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार का बालमन अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों के खिलाफ विद्रोह कर उठा। 19 जुलाई 1905 में लार्ड कर्जन द्वारा बंग भंग की घोषणा के बाद जब मां भारती के सपूतों ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का निर्णय लिया। इस आंदोलन के साथ भाईजी भी जुड़ गए और जुलाहों के हाथ की कती-बुनी मोटी खादी पहनने लगे।
उन्हीं दिनों 1906 में कलकत्ता में इंडियन नेशनल कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में 15 वर्ष की आयु में हनुमान प्रसाद कांग्रेस के सदस्य बन गए। 1969 की बर्दवान की प्रलयंकारी बाढ़ में पीडि़तों की भरपूर सहायता की। इसके कुछ दिनों के बाद विप्लववादी कार्यकलापों में संलग्न होने के आरोप में कुछ लोग राष्ट्रद्रोह के अपराधी घोषित कर दिए गए, उनमें हनुमान प्रसाद भी एक थे। क्रांतिकारियों के पास गीता सदैव रहती थी। यह देख क्रांतिकारियोंके पास गीता सदैव रहती थी। यह देखकर हनुमान प्रसाद ने खड्गहस्ता भारत माता के चित्र सहित गीता का प्रकाशन करवाया और फिर जयदयाल गोयन्दका के संपर्क में जो बाद गीताप्रेस के संस्थापक बने।
कलकत्ता में नौ प्रमुख क्रांतिकारियों को जब देश निकाला का आदेश दिया गया तो, क्रांतिकारी समिति के सदस्य हनुमान प्रसाद ने इन देश भक्तों के विरुद्ध चलाए गए मुकदमों की पैरवी में काफी भाग-दौड़ की। 16 जुलाई 1914 को उन्हें तीन साथियों सहित राष्ट्रद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। इस समय उनके खास शुभचिंतकों ने अंग्रेजों के भय से साथ छोड़ दिया। ऐसे समय में हनुमान प्रसाद को भगवान की याद आई। इनकी रिहाई तो हुई लेकिन आजीवन राजनीति में भाग न लेने की मांग को जब इन्होंने खारिज कर दिया तो 1975 के दूसरे सप्ताह में इन्हें बंगाल छोडऩे का आदेश दे दिया गया।
पिता का निधन व भूकंप के चलते घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई थी। कलकत्ता में शुभचिंतकों ने किनारा कस लिया था। ऐसे में सेठ जमनालाल बजाज के बुलावे पर वह मुंबई चले गए और व्यवसाय शुरू किया। इसके साथ ही नाम जप उनका चलता रहा। इसी बीच सेठजी जयदयाल गोयन्दका से भेंट हुई और उनका भगवत्प्रेम और प्रबल हुआ। एक दिन उन्हें भगवान राम के दर्शन हुए। उनके मौसेरे भाई अपने मिलने वालों से उनका परिचय अपने भाई के रूप में कराते थे, लोग उन्हें भाईजी कहना शुरू कर दिए।
भाईजी की इच्छा पर जयदयाल गोयन्दका ने सहमत होते हुए कल्याण पत्रिका निकालने की बात मान ली। भाईजी उसके संपादक बने। संतों की संगत से भाई की भगवत्प्राप्ति की अभीप्सा प्रबल होती गई। इसी अभीप्सा के चलते उन्होंने मुंबई का सारा कारोबार समेट कर 35 वर्ष की आयु में भाद्र कृष्ण 12 संवत 1984 (1927) में गोरखपुर के लिए रवाना हो गए। इसके साथ कल्याण का कार्यालय भी मुंबई से स्थानांतरित होकर गोरखपुर आ गया। यहां वह पूरी तरह कल्याण के काम की व्यवस्था में लग गए। उनके मन में भगवत्दर्शन की लालसा दिनोंदिन तीव्र होती जा रही थी, वह समय शीघ्र ही आ गया और उन्हें राम, विष्णु व ब्रह्माजी का एक साथ दर्शन हुआ। 1928 में उन्होंने गोरखपुर में एक साधन कमेटी, गीता व रामायण परीक्षा समिति की स्थापना की। बाढ़ पीडि़तों व स्वतंत्रता सेनानियों की सेवा की। उनका सेवा कार्य बढ़ा तो एक आश्रम की जरूरत महसूस हुई और यहां गीता वाटिका की स्थापना की। 1934 में एक वर्ष के वृहद संकीर्तन का आयोजन किया। जब गोरखपुर में महात्मा गांधी व पं. जवाहरलाल नेहरू आए तो उनसे मिले। जेल में बंद वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ ही यहां के बाढ़ पीडि़तों की सेवा करते रहे। 22 मार्च 1971 को प्रात: 7.55 बजे उनका महाप्रयाण हो गया।

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