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6 सितंबर 2011 का दिन। राजघाट थाने ने एक ट्रक पर लदे, शायद कटने के लिए ले जाए जा रहे 51 गोवंश पकड़ा था। इसमें 14 देशी बूढ़ी गाएं, 17 बैल व शेष बछड़े-बछिया थे। सभी गाएं देशी थीं। दूसरे दिन अखबारों में छपी खबर ने इस शहर के कुछ युवाओं की संवेदना को झकझोरा। वे बिना अभिभावकों को बताए राजघाट थाने पहुंच गए। गायों को पोषित करने का भरोसा दिलाया और लिखा पढ़ी के बाद 8 सितंबर को उन्हें प्राप्त कर लिया। इस दौरान अभिभावकों को यह बात पता चली। वे बच्चों की इस पहल से खुश हुए और इस कार्य में भरपूर मदद की। एक व्यक्ति ने गोशाला के लिए अपनी जमीन दे दी। इस तरह महानगर में सेवा के भाव से एक गोवत्स गोशाला अस्तित्व में आई।
अखबारों में खबर पढ़कर मुकुंद अग्रवाल ने अपने मित्रों से संपर्क किया। युवाओं की इस मित्र मंडली को देश की सबसे बड़ी गोशाला के संचालक राधाकृष्ण महाराज कई बार गोरखपुर आगमन के दौरान भगवन्नाम संकीर्तन व गोसेवा के प्रति प्रेरित कर चुके थे। युवाओं की मंशा को विजय जालान ने अपनी एक एकड़ जमीन व श्याम मनोहर अग्रवाल ने साथ खड़े होने का आश्वासन देकर संबल प्रदान किया। यह जमीन सहारा स्टेट के सामने है। वहां शेड व एक नाद पहले से तैयार था। अब कई शेड व नाद वहां बना दिए गए हैं। बाद में 17 बैल लिखा-पढ़ी के बाद आसपास के गांवों के किसानों को मात्र एक हजार रुपये सुपर्द कर दिए गए। इन युवाओं ने कुछ और गाएं जो भूख व बीमारी से बेहाल सड़कों पर काफी दिनों से पड़ी थीं, उन्हें ले आए। कुछ गाएं दान में आईं। तीन गाएं नीलसुंदर जालान ने दी। गायों की देखरेख के लिए चार कर्मचारी भी लगाए गए हैं।
आज वहां गोवंश की संख्या 48 है जिसमें 29 गाएं, दो साड़, 6 बछड़े व 11 बछिया हैं। इनमें एक कपिला गाय भी है जो भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रिय थी। इस समय कुल 5 गाएं दूध दे रही हैं। कुल दूध 22 लीटर होता है। दूध से कुल आय लगभग 32 हजार रुपये मासिक है, लेकिन गोशाला में महीने का खर्च 1 लाख 10 रुपये है। इस तरह गोशाला प्रतिमाह 80 हजार रुपये के घाटे में है। ये सभी युवा संपन्न परिवारों के हैं। इसलिए यह घाटा महानगर के वही आठ युवा- सुमित रूंगटा, मुकुंद अग्रवाल, नीलसुंदर जालान, पुनीत अग्रवाल, कनकहरि अग्रवाल, विनीत अग्रवाल, गौरव जिंदल व आशीष अग्रवाल आपस में मिलकर पूरा करते हैं। ये सभी युवा प्रति रविवार वहां जाकर गायों की सेवा तथा भगवन्नाम संकीर्तन करते हैं। अब वहां होली महोत्सव, मीराबाई का जन्म दिन व गोपाष्टमी पर्व मनाया जाता है। साथ ही किसी सदस्य का जन्मदिन पड़ता है तो वह गोशाला में जाकर गायों के साथ मनाता है।
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देशी गायों के प्रति मन में अगाध श्रद्धा थी। जब देशी गोवंश पकड़े जाने की खबर मिली तो उन्हें संरक्षित करने का मन में भाव उठा। हम लोगों ने कदम बढ़ाया और परमात्मा ने साथ दिया। बिना परेशानी के गाएं हमें मिल गई। उन्हें रखने के लिए जमीन मिल गई। उनके खर्चे उठाने के लिए मित्र तैयार हो गए और गोशाला स्थापित हो गई।
-मुकुंद अग्रवाल, संचालक मंडल

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