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मारकंडेय पुराण में वर्णित कथानक ही देवी मृतिका मूर्ति पूजा का आधार है। परब्रह्म परमात्मा सर्वविश्व में निहित है। इसलिए मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा कर मूर्ति का प्रचलन अनादि काल से चला आ रहा है। वेदों की ऋचाओं में जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि, आकाश में निहित प्राण सत्ता में ईश्वरीय सत्ता की अभिव्यक्ति है। पौराणिक युग में इसे विग्रह के रूप में स्थापित कर पूजन प्रारंभ हुआ। मारकंडेय पुराण के अनुसार राजा और वैश्य जो महामोह से ग्रसित थे, देवी की मूर्ति बनाकर आराधना करने लगे। राजा को राज्य व वैश्य को ज्ञान की प्राप्ति हुई। इस प्रकार वह देवी लौकिक व पारलौकि दोनों अभिष्टों को प्रदान करने वाली मानी गई।
-आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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