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मियॉं बाजार स्थित मियां साहब इमामबाड़ा वास्तुकला, सामाजिक एकता व अकीदत का अहम मरकज है। यह गोरखपुर का मरकजी इमामबाड़ा है। भारत में सुन्नी सम्प्रदाय के सबसे बड़े इमामबाड़े के रूप में इसकी ख्याति है। 18वीं सदी के सूफीसंत सैयद रौशन अली शाह का फैज जारी है। यहां हर मजहबें के मानने वालों की दिली मुरादें पूरी होती है। इमामबाड़ा की शान पुरानी चकम दमक के साथ बरकरार है। इमामबाड़ा मुगल वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। इसकी दरों दीवार की नक्काशी लाजवाब है। इसके चार बुलंद दरवाजे इसकी बुलंदी बयां करते है। यह गोरखपुर रेलवे स्टेशन से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर स्थित है। यह भारत का इकलौता इमामबाड़ा है जहां सोने-चांदी की ताजिया है। दर्शन करने लोग दूर-दूर से आते है। करीब तीन सौ वर्षों से बाबा रौशन अली शाह द्वारा जलायी धूनी आज भी बदस्तूर जारी है। मोहर्रम मनाने की परम्परा यहां अनोखी है। इसका श्रेय इमामबाड़ा स्टेट को जाता है।
मियां साहब इमामबाड़ा व सूफीसंत सैयद रौशन अली तारीख के आईने में
मियां साहब अदनान फर्रूख शाह
मियां साहब इमामबाड़ा के पांचवे सज्जादानशीन मियां अदनान फर्रूख अली शाह के मुताबिक रौशन अली शाह करीब सन् 1707 ई. में गोरखपुर तशरीफ लायें। उन्होंने यहां पर इमामबाड़ा तामीर करीब सन् 1717 ई. मंे किया। इस बाबत कोई ठोस साक्ष्य इस समय उनके पास उपलब्ध नहीं है। पहले जखीम रिकार्ड मौजूद था। जो अब खत्म हो चुका है। उन्हांेंने बताया कि तारीख पर काम चल रहा है। अगले साल इमामबाड़ा व रौशन अली शाह की पूरी तारीख आवाम के सामने होगी। रिवायत के अनुसार सूफीसंत सैयद रौशन अली शाह बुखारा के रहने वाले थे। वह मोहम्मद शाह के शासनकाल में बुखारा से दिल्ली आये। इतिहासकार डा. दानपाल सिंह की किताब गोरखपुर-परिक्षेत्र का इतिहास (1200-1857 ई. ) खण्ड प्रथम में गोरखपुर और मियां साहब नाम से पेज 65 पर है कि यह एक धार्मिक मठ है जो गुरू परम्परा से चलता है। दिल्ली पर अहमद शाह अब्दाली क आक्रमण 1760 ई. के समय इस परम्परा के सैयद गुलाम अशरफ पूरब चले आये और बांसगांव तहसील के धुरियापार में ठहरे वहां पर उन्होंने गोरखपुर के मुसलमान चकलेदार की सहायता से शाहपुर गांव बसाया। इनके पुत्र सैयद रौशन अली अली शाह की इच्छा इमामबाड़ा बनाने की थी। वजह अहले बैत से मोहब्बत बेइंतेहा थी। सैयद रौशन अली शाह बहुत मुत्तकी परहेजगार बुजुर्ग थे। हमेशा खुदा की इबादत में लगे रहते थे। गोरखपुर में उन्हें अपने नाना से दाऊद-चक नामक मुहल्ला विरासत मंें मिला था। उस समय अवध का नवाब आसफ-उद्दौला था। जिसने रौशन अली शाह को 15 गांवों की माफी जागीर दी। उन्होंने एक बड़ा इमामबाड़ा बनवाया जो आज भी मौजूद है। जब अवध के नवाब ने गोरखपुर को अंग्रेजों को दे दिया तब अंग्रेजों ने भी इनकी माफी जागीर को स्वीकृत कर दिया। इमामबाड़ा सियासत से हमेशा दूर रहा है। हर मजहब के मानने वालों से हुस्ने सुलूक से पेश आना मशगला रहा। यहीं वजह है जब 1857 की जंगे आजादी में अंग्रेजों की जान पर बन आयी तो इस दरबार में आकर पनाह ली। चुनांचे तत्कालीन मियां साहब ने इंसानियत के नाते अंग्रेजों का कुसुम्ही कोठी में पनाह दी। इस एवज में अंग्रेजों ने उनकोे गोरखपुर और पडरौना तहसील में माफी जागीर के अतिरिक्त कई गुना बड़ी जागीर दी।

मशहूर वाकिया
तारीख के आईने में एक वाकिया बहुत मशहूर है । अवध के पहले नवाब बुर्हानुल मुल्क, शहादत खां थे जिन्हें वर्ष 1719 ई. में गद्दी नशीनी हासिल हुई थी। दूसरे नवाब सफदरजंग थें जिन्हें 1737 ई. में गद्दी संभाली। शुजाउद्दौला को 1753 ई. में अवध के नवाब होने का सर्फ हासिल हुआ। 1764 में अवध के नवाब एवं अंग्रेजों में बक्सर का युद्ध हुआ, जिसमें अवध का नवाब शुजाउद्दौला पराजित हुआ। 1775 में शुजाउद्दौला की मृत्यु हुई। चौथे नवाब आसफ-उद्दौला को 1775 ई. मंे अवध की नवाबी मिली। नवाब आसफ-उद्दौला शिकार के बेहद शौकीन थे। मुताबिक 1784 ई में सर्दी के मौसम में अवध के नवाब शिकार खेलने गोरखपुर आये। उस वक्त अवध की राजधानी फैजाबाद हुआ करती थी। हाथी पर शिकार करते हुए वह गोरखपुर के घने जंगलों में आ गये। इसी घने जंगल में धूनी (आग) जलाये एक बुजुर्ग बैठे थे। जिनका नाम सैयद रौैशन अली शाह था। धूनी जलाये हाथों मंे चिमटा लिये ईश्वर की प्रार्थना में लीन । शिकार के दरम्यान उन्होंने देखा एक बुजुर्ग कड़कड़ाती ठंडक में बिना वस़्त्र पहने धूनी जलाये बैठा है चंूकि नवाब दयालू थे उन्होंने अपनी कीमती दोशाला (शाल) उन पर डाल दी, लेकिन बाबा ने उस धूनी में शाल को जला कर राख कर दिया। यह देख कर नवाब नाराज हुए उन्होंने रौशन अली शाह से कहा कि आप को इस ठंडक में शाल की जरूरत थी जो मैने आप को दिया पर आप ने उसे धंूनी मंे जला दिया। यह सुन रौशन अली शाह ने धूनी की राख में चिमटा डाल कर कई कीमती दौशाला (शाल) निकाल कर दिया। यह देख नवाब समझ गये कि यह कोई मामूली शख्स नहीं बल्कि अल्लाह का वली है। नवाब आसफ-उद्दौला ने तुरंत हाथी से उतर कर मांफी मांगी उनकी बुजुर्गी के कायल हो गये और बुजुर्ग रोशन अली शाह से उनके लिए कुछ करने की इजाजत चाही, सूफी रोशन अली शाह ने नवाब से इमामबाड़े की विस्तृत तामीर के लिए कहा जिसे नवाब ने माना और इमामबाड़ा तामीर करवाया। रौशन अली शाह की इच्छानुसार उसने छह एकड़ के इस भू-भाग पर इमाम हुसैन की याद मंे मरकजी इमामबाड़े की तामीर शुरू कराई। उन्हीं के जमाने में मोहर्रम मनाने का यह सिलसिला चला जो आज भी जारी है। हालांकि इमामबाड़ा की बुनियाद बहुत पहले से पड़ चुकी थी। सन् 1796 ई. में इमामबाड़ा को विस्तृत रूप अवध के नवाब आसफ-उद्दौला ने दिया था। 12 साल बाद 1796 ई में मुकम्मल तौर इमामबाड़ा तैयार हो गया। वही इमामबाड़ा आज इतिहास का साक्षी है । इमामबाड़े की तामीर करने के बाद अवध के नवाब आसफ-उद्दौला ने 5.50 किलो सोने से बने ताजिया को यहां भेजा था। नवाब की बेगम ने चांदी का ताजिया इसी वजन या इससे कम कुछ कम वजन का ताजिया भेजा। इमामबाड़ा मुगलकालीन वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। इसकी दरों दीवार में मुगलिया वास्तुकला रची बसी नजर आती है। जो ऐतिहासिकता का अनुभव कराती है।
सतासी के राजा पहलवान सिंह ने मौजा कुसम्ही और उससे सटे जंगल को सन् 1793 ई. में इमाम हुसैन के फाातिहा नियाज के लिए दान कर दिया। अवध के शिया शासक आसिफुद्दौला ने सन् 1796 ई. में करीब 15 गांव ,दस हजार रूपये नगद सैयद रौशन अली शाह को दिया।(स्र्रोत विकीपीडिया)
इमामबाड़ा की दरो दीवार काफी पुरानी हो जाने के कारण सन् 2000 तक काफी खस्ताहाल हो गयी। तो उसकी मरम्मती तामीर करायी गयी। सन् 2003 ई. से लेकर अब तक काफी काम हुआ। आज इमामबाड़ा बेहतरीन स्थिति में नजर आ रहा है। पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में गोरखपुर की शान है।

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