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कुशीनगर। ओशो मैत्रेय ध्याीन केंद्र में आयोजित त्रिदिवसीय ध्यानन साधना शिविर का मंगलवार को संध्याे सत्संवग के साथ समापन हुआ। नृत्य, उत्सव व उल्लास से माहौल परिपूर्ण रहा। कुल 14 लोगों ने संन्यास लेकर जीवन की नई पारी शुरू की। शिविर में ओशो द्वारा प्रदत्त अनेक ध्याकन विधियों का सघन प्रयोग कराया गया। स्वा्मी आनंद विजय के निर्देशन में तीन दिन तक सांसारिक गतिविधियों से पूरी तरह कटकर साधकों अपने भीतर प्रवेश करने की कोशिश की और अंतिम दिन गुरु के प्रति अहोभाव प्रकट करते हुए संध्याअ सत्संकग में जमकर झूमे।
संन्यास के समय माहौल उत्सव पूर्ण था। सभी के पैर थिरक रहे थे। संन्यास लेने वाले नए जीवन में प्रवेश की खुशी में नाच रहे थे तो पुराने संन्यासी अपने मार्ग पर कुछ नए सहयात्रियों के आ जाने से खुश थे। वहां नृत्य था और ध्यान की ऊर्जा व शांति अपनी गरिमा में उपस्थित थी। संन्यास स्वा मी आनंद विजय व मां जीवन दर्पण ने दिया। इसके पूर्व दिन में डायनामिक मेडिटेशन, विपश्याना, अनापानसाती योग, तथाता, नटराज व कुंडलिनी आदि ध्यारन प्रयोग कराए गए। स्वा,मी आनंद विजय की उपस्थिति में साधकों ने अपराह्न 3 से 4 बजे तक रामाभार स्तूपप के पास मौन ध्या्न का आनंद लिया। बीच में ओशो के आडियो प्रवचन का भी लाभ उठाया। ओशो ने प्रवचन में कहा कि त्याग की प्रक्रिया नकारात्मक है और उसी के कारण धर्म मुर्दा हो गया है। मैं तुम्हें परमात्मा का भोग सिखाता हूं, संसार का त्याग नहीं। संसार का भोग आ जाए तो संसार का त्याग अपने से घटता है। जिसे श्रेष्ठ मिलने लगे उसका निकृष्ट अपने से छूट जाता है, निकृष्ट को छोड़ने से श्रेष्ठ नहीं मिलता। इसलिए मेरा पूरा जोर श्रेष्ठ को पाने पर है, निकृष्ट को छोड़ने पर नहीं। इसी क्रम में उन्होंने नवसंन्यास पर बोलते हुए कहा कि मेरे संन्यासी के लिए नियम आबद्धता नहीं है कि ब्रह्म मुहूर्त में उठना, इतने बजे ध्यान करना, ऐसे रहना-वैसे रहना आदि। मेरा संन्यासी जब भूख लगेगी तो खाना खा लेगा, जब नींद आएगी तो सो जाएगा, जब नींद खुलेगी तभी ब्रह्म मुहूर्त। किसी तरह की कोई बाध्यता नहीं है, मेरा संन्यासी वर्जनाओं से पूरी तरह मुक्त होगा।

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