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हिंदू काल गणना में नवरात्र दो बार मनाया जाता है। पहला ग्रीष्म ऋतु के आगमन पर चैत्र नवरात्र व दूसरा शरदकालीन अश्विन नवरात्र। ये दोनों समय ऋतुओं के संधिकाल हैं। चैत्र नवरात्र में शीत ऋतु का अंत और ग्रीष्म ऋतु का आगमन और शारदीय नवरात्र में ग्रीष्म का अवसान व शीत के आगमन का समय होता है। दोनों नवरात्रों में विशेषकर शक्ति की पूजा होती है। शारदीय नवरात्र को सर्वोपरि माना जाता है। बंगाल में इसे अकालबोधन कहते हैं। दुर्गा परमात्मा की शक्ति हैं। ज्ञान, क्रिया व इच्छा इनके तीन नेत्र हैं। महषिासुर मर्दिनी का प्रतीक विद्या द्वारा अविद्या के संहार का परिचायक है। इस विराट विश्व में महामोह के रूप में मधु-कैटभ, महिष, शुंभ-निशुंभ चारो ओर व्याप्त हैं। इस महामोह के जाल को महाशक्ति सिंह पर आरूढ़ होकर नष्ट करती हैं।
-आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी, आजाद चौक, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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