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दीपावली 11 नवंबर को परंपरागत रूप से आस्था व श्रद्धा के साथ मनाई जाएगी। रोशनी के इस पर्व पर अंधेरे को भगाने का पूरा इंतजाम करने में शहर जुट गया है। कुम्हारों ने मिट्टी के दीये बनाने शुरू कर दिए हैं। एक कुम्हार के आंकलन के मुताबिक इस वर्ष पूरे शहर में कुल मिलाकर लगभग तीन करोड़ मिट्टी के दीये तैयार हो रहे हैं। पिछले वर्ष भी इसी के आसपास दीये बने और बिक गए थे।
दीपावली पर मिट्टी का दीया जलाना हमारी परंपरा है। हम रोशनी के लिए चाहे कितने ही इलेक्ट्रानिक उपकरणों का उपयोग क्यों न कर लें, लेकिन हर परिवार में मिट्टी का दीया जलाया जरूर जाएगा। गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों व घर के आवश्यक स्थानों पर मिट्टी का ही दीया जलाया जाता है। इसलिए मिट्टी के दीयों की जरूरत पूरी करने के लिए बक्शीपुर, रेती, शेखपुर, तिवारीपुर, तुर्कमानपुर, घासीकटरा, चौरहिया गोला, हांसूपुर, रायगंज, बसंतपुर आदि मुहल्लों में कुम्हार मिट्टी के दीये तैयार करने में जुट गए हैं। पूरा परिवार मिलकर मिट्टी के दीयों के अलावा पंचदीप, मानी का दीया, घंटी, कोशा, परई व भरुका (चुक्कड़) तैयार कर रहा है। लगभग एक करोड़ दीये बनकर तैयार हो चुके हैं। परंपरागत चाक के अलावा समय की बचत के लिए कुम्हार इलेक्ट्रानिक चाक भी इस्तेमाल कर रहे हैं। बक्शीपुर में विकलांग आनंद प्रजापति भी पूरे मनोयोग से दीया बनाने में जुटे हुए हैं। ओमप्रकाश, जितेंद्र आदि ने पिछले वर्ष 35 हजार दीया बनाया था, इस बार 20 हजार ही बना रहे हैं। उनका कहना है कि यदि समय से मिट्टी आ गई तो संख्या बढ़ा देंगे। इसके साथ टिंकू प्रजापति ने गणेश-लक्ष्मी की छोटी-छोटी मूर्तियां बनाई हैं। ये मूर्तियां हैं तो मिट्टी की लेकिन पेंट करने के बाद इनकी फिनीसिंग ऐसी हुई है कि ये किसी धातु की लगती हैं। उन्होंने लगभग तीन सौ मूर्तियां अकेले बनाई है। उनका कहना है कि महानगर में लगभग एक दर्जन कलाकार इस तरह की मूर्तियां बना रहे हैं।
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मिट्टी की महंगाई ने कमर तोड़ दी
ज्योति, ओमप्रकाश, टिंकू, कुंज बिहारी व लालचंद प्रजापति ने बताया कि एक तो मिट्टी महंगी हो गई है, दूसरे मिट्टी के लिए डीएम साहब से अनुमति लेनी पड़ रही है। अनुमति के लिए लगभग दस दिन लग जाते हैं। डीएम साहब का शुक्र है कि उन्होंने समय से अनुमति दे दिया और मिट्टी गिर गई। लेकिन महंगाई मार रही है।
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दीये का घाटा मूर्तियों से करते हैं पूरा

मिट्टी पिछले साल दो हजार रुपये प्रति ट्राली थी, इस बार तीन हजार रुपये प्रति ट्राली हो गई है। एक ट्राली में 25 से 30 हजार दीये तैयार होते हैं। अर्थात एक दीया की लागत लगभग एक रुपये आती है। 10 लोग मिलकर बीस दिन मेहनत करते हैं, तब तीस हजार दीया तैयार होता है। इसके अलावा इसे पकाने में लगभग डेढ़ हजार रुपये और दस दिन का समय लगता है। इसके बावजूद इसे 50 रुपये सैकड़ा बेचा जाता है। बिल्कुल लागत से आधी कीमत पर। यह पूरी तरह घाटे का सौदा है, फिर भी परंपरा को जीवित करने के लिए हम लोग दीया बनाते हैं। यह पूछने पर कि घाटे का यह सौदा कब तक करते रहेंगे और क्यों करते हैं? उन्होंने कहा कि मिट्टी के अन्य पात्रों से हमें आय हो जाती है। अधिकांश कुम्हार अब मूर्तियां भी बनाने लगे हैं। उन्होंने कहा कि बहुत दिनों तक मिट्टी के दीया का कारोबार नहीं चल पाएगा।
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दीपावली पर दीया ही जलाएं
हर व्यक्ति को मिट्टी का ही दीया जलाना चाहिए। मैंने स्वयं तय किया है कि इस दीपावली पर अपने घर मिट्टी का दीया व तिल के तेल का ही उपयोग करेंगे। लोगों से यह भी अनुरोध है कि पटाखे फोडऩे से बचें। इससे तमाम तरह की जहरीली गैसें निकलती हैं जो गंभीर बीमारियों को जन्म दे सकती हैं।
-डा. जय कुमार, बाल रोग विशेषज्ञ जिला महिला चिकित्सालय
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मोमबत्ती से बेहतर मिट्टी का दीया
मिट्टी का दीया हमारी परंपरा में शामिल है। इसका बड़े पैमाने पर प्रयोग करने की जरूरत है। मोमबत्ती से बेहतर है मिट्टी का दीया। इसके अलावा पटाखों आदि से परहेज करने की जरूरत है। इनका धुंआ सांस के रास्ते भीतर जाता है और लोगों को खासकर दमा के मरीजों को बहुत नुकसान पहुंचाता है।
-डा. एनके द्विवेदी, जिला महिला चिकित्सालय

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