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ज्योतिर्विज्ञान केवल आकाशीय पिंडों की गति, स्थिति की जानकारी तक सीमित नहीं है। ग्रहों के पृथ्वी के वातावरण एवं प्राणियों पर पडऩे वाले प्रभावों का अध्ययन-विश्लेषण और परस्पर आदान-प्रदान से लाभ उठाना भी इसका उद्देश्य है। इस संबंध में यह जिज्ञासा अंकुरित होनी सहज है कि यदि अन्यान्य ग्रह पृथ्वी के जीवन को प्रभावित करते हैं तो उनका प्रभाव सब स्थान पर एक सा क्यों नहीं होता है? इसके प्रत्युत्तर में पैरासेल्सस का कथन है कि जिस प्रकार एक ही भूमि में बोए गए आम, नीम, बबूल अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार गुण-धर्मों का चयन कर लेते हैं और सोने की खदान की ओर सोना, चांदी की ओर चांदी और लोहे की खदान की ओर लोहा आकर्षित होता है, ठीक उसी प्रकार पृथ्वी के जीवधारी विश्व चेतना के अथाह सागर में रहते हुए भी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुरूप अंतर्ग्रहीय अनुदानों को ग्रहण करते हैं तथा भले-बुरे प्रभावों से प्रभावित होते हैं। पूर्णिमा के दिन जब चंद्रमा अपनी पूर्णता को प्राप्त होता है। तो मन:स्थिति पर प्रभाव डालता है लेकिन यह प्रभाव एक समान नहीं होता है। कमजोर व असंतुलित मन:स्थिति के व्यक्तियों में इसकी प्रतिक्रिया अधिक दिखाई देती है। जबकि संतुलित व दृढ़ मन:स्थिति वाले व्यक्तियों में इसके प्रभाव उतने नहीं होते। भारतीय ज्योतिष में ग्रहों का स्वरूप इस प्रकार कहा गया है-
सूर्य- यह प्राण तत्व का अधिष्ठाता है। यह हमारे जीवन में क्रिया शक्ति प्राण शक्ति के रूप में परिलक्षित होता है।
चंद्र-यह मन का अधिष्ठाता है और चिंतन प्रक्रिया को प्रतिक्षण प्रभावित करता है।
मंगल- यह इच्छा, वासना, काम से संबंधित है।
बुध- मन की विविध क्षमताओं से सूक्ष्म रूप से जुड़ा है।
गुरु- यह अध्यात्मिक शक्ति, संवेदना, भावना व श्रद्धा को प्रभावित करता है।
शुक्र- यह अंतर्मुखी प्रकृति को जन्म देता है।
शनि- यह प्रकृति का अधिष्ठाता तथा पृथ्वी तत्व प्रधान ग्रह है।
राहु- राहु में शनि के सूक्ष्म प्रभाव अंतर्निहित हैं।
केतु- इसमें मंगल ग्रह की सूक्ष्मताएं समाहित हैं।
भारतीय ज्योतिष की ही भांति पाश्चात्य ज्योतिर्विद एवं चिकित्सा शास्त्री डेविड काम्वे ने अपनी पुस्तक 'मैजिक ऑफ हवर्सÓ में मनुष्य के शरीर और उसके विभिन्न भागों पर ग्रहों, राशियों के तारतम्य एवं प्रभाव का वर्णन इस तरह किया है-
1- मेष राशि का अधिपति मंगल ग्रह शरीर के मस्तिष्क के क्रिया-कलापों से संबंधित है।
2-वृष राशि का अधिपति शुक्र है, इसका संबंध शरीर के ग्रीवा, कंठ से है।
3- मिथुन राशि का अधिपति बुध है, इसका संबंध छाती व पेट से है।
4- कर्क का अधिपति चंद्रमा है, इसका संबंध शरीर के पृष्ठ भाग से है।
5- सिंह राशि का अधिपति सूर्य है इसका संबंध शरीर के हृदय, मेरुदंड तथा कोहनी से है।
6- कन्या राशि के अधिपति बुध का संबंध हाथ, आंतों तथा विसर्जन तंत्र से है।
7- तुला राशि के अधिपति शुक्र का संबंध शरीर के पिछले भाग तथा मूत्राशय तंत्र से है।
8- वृश्चिक राशि का अधिपति मंगल है, इसका संबंध पेड़ू तथा जननांग से है।
9- धनु राशि का अधिपति गुरु ग्रह है, इसका संबंध जांघ, नितंब व यकृत से है।
10- मकर राशि का अधिपति शनि है, इसका संबंध घुटनों तथा अस्थि संस्थान से है।
11- कुंभ राशि का अधिपति ग्रह शनि है, इसका संबंध पैरों व टखनों से है।
12- मीन राशि का अधिपति गुरु ग्रह है, इसका संबंध पैर तथा नाड़ी संस्थान से है।
जीवन के दृश्य-अदृश्य सभी आयामों की जितनी सम्यक व्याख्या ज्योतिष में है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं है। प्रसिद्ध विद्वान पैरासेल्सस ने ज्योर्विज्ञान का उपयोग चिकित्सा जगत के लिए लाभप्रद बताया है। उनका कथन है कि मैक्रो-कॉस्मिक प्रभाव के अनुसार मनुष्य शरीर पर पर माइक्रोकॉस्मिक प्रभाव पड़ते रहते हैं। चिकित्सा शास्त्र से इसका अति घनिष्ठ संबंध है। उन्होंने शरीर के अंगों-अवयवों एवं ग्रह-नक्षत्रों का संबंध बताने वाली एक सूची भी बनाई। उनके इस प्रयास के परिणाम से अंतग्र्रहीय शक्तियों के शरीर की क्रियाओं का औषधियों पर होने वाले प्रभावों के अनेक प्रयोगों का संकलन ज्योर्विज्ञान के रूप में सामने आया। पैरासेल्सस अपने युग के महान चिकित्साशास्त्री थे। उनका विख्यात ग्रंथ है- 'द फंडामेंडो सेपियेंटीÓ। इसमें उन्होंने लिखा है कि आधुनिक चिकित्सा प्रणाली ने मनुष्य के स्थूल शरीर की जानकारी का विवेचन किया है किंतु मनुष्य के शरीर में निवास करने वाली चेतना सत्ता का इसमें कोई विवरण नहीं है। जबकि मानव चेतना व्यष्टि में होते हुए भी समष्टि के चैतन्य प्रवाहों से अविछिन्न रूप से जुड़ी हुई है और भले-बुरे प्रभावों से प्रभावित होती है। उनका मानना है कि असाध्य शारीरिक रोगों को दूर करने के लिए शरीर निदान, मनोविश्लेषकों के साथ अंतग्र्रहीय प्रभावों की जानकारी प्राप्त करना बेहद आवश्यक है। क्योंकि पृथ्वी सौर मंडल के अन्याय ग्रहों से जुड़ी है और इनकी गति स्थिति से प्रभावित होती है। इसलिए मानवीय स्वास्थ्य केवल धरती के वातावरण से ही संबंधित नहीं है बल्कि अंतग्र्रहीय स्थितियों से भी जुड़ा है। अंतर्ग्रहीय प्रभावों के अध्ययन के क्रम में बोस इंस्टीट्यूट कोलकाता के माइक्रोबॉयोलॉजी के वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि सौर मंडल के विकिरण से वायुमंडल के जीवाणुओं का नियंत्रण होता है। 16 फरवरी 1980 के पूर्ण सूर्यग्रहण के अवसर पर कोलकाता के प्रख्यात 'बोटेनिकल गार्डनÓ के वायु मंडल में बैक्टीरिया, फंजाई एवं घातक जीवाणु प्रचुर मात्रा में पाए गए थे। सूर्यग्रहण से पहले और उसके बाद विभिन्न जीवाणुओं का अध्ययन करने पर पाया गया कि सूर्यग्रहण के समय न केवल इनकी संख्या में वृद्धि हुइ बल्कि इनकी मारक क्षमता भी पहले से अधिक थी। इस तथ्य की पुष्टि रीवा विश्वविद्यालय के 'विक्रम फिजिक्स सेंटर ऑफ इन्वायरमेंटल बायोलॉजीÓ के वैज्ञानिक प्रयोगों से हुई। इन वैज्ञानिकों ने देखा कि सूर्य ग्रहण के अवसर पर पानी को खुला छोड़ देने पर उसमें विभिन्न प्रकार के विषाणु और जीवाणु आकर उसे विषाक्त कर देते हैं।
इस तथ्य से प्राचीन भारतीय ऋषि भलीभांति सुपरिचित थे, तभी निर्देश दिए थे कि सूर्य और चंद्रमा के समय किसी भी प्रकार का अन्न अथवा आहार ग्रहण न किया जाए। उन्होंने इस दिन उपवास करने की परंपरा स्थापित की थी। तत्ववेत्ता ऋषि ग्रहण काल में पृथ्वी पर पडऩे वाले अंतग्र्रहीय दुष्प्रभावों से परिचित थे। वे यह भी जानते थे कि ग्रहण के समय खाना-पीना शरीर पर हानिकारक प्रभाव डालता है। अंतरिक्ष से आने वाले दुष्प्रभावों से बचाव के लिए व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर उपासना, साधना के उपचार किए जाते थे, जो आज भी विभिन्न स्थानों पर व्यक्तिगत रूप से प्रचलित हैं। सूर्य और चंद्रग्रहण के अवसर पर नदियों आदि में स्नान की परंपरा है। इस संबंध में वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रवाहित जल में प्राण ऊर्जा की प्रचुरता अधिक होती है। इस अवसर पर उपवास, स्नान, उपासना को कुछ लोग महत्वपूर्ण नहीं मानते नवीन वैज्ञानिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि सभी क्रियाएं वैज्ञानिक हैं जो शरीर सुरक्षा व उपचार के सशक्त व सक्षम माध्यम हैं। इसलिए स्थूल अध्ययन, विश्लेषण एवं उपचार के लिए किए गए प्रयत्नों के साथ-साथ अंतर्ग्रहीय प्रभावों की जानकारी रखना तथा उपचार के उपाय ढूढना भी आवश्यक हो जाता है।
कहना होगा कि यह सारा ज्ञान ज्योतिर्विज्ञान से संभव है। मनुष्य की प्रकृति एवं स्वभाव का गहरा संबंध ज्योतिर्विज्ञान से है। इसके अंतर्गत पिंड और ब्रह्मांड, व्यष्टि एवं समष्टि, आत्मा और परमात्मा के संबंधों का अध्ययन सम्मिलित रूप से किया जाता है। ग्रह, नक्षत्र, तारें, राशियां, मंदाकिनियां, नीहारिकाएं एवं मनुष्य, प्राणी, वृक्ष, चट्टानें आदि ब्रह्मांडीय घटक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से एक-दूसरे को प्रभावित एवं आकर्षित करते हैं। इन ग्रह-नक्षत्रों का मानव जीवन पर सम्मिलित प्रभाव पड़ता है। ये कभी कष्ट देते हैं तो कभी एक-दूसरे का कष्ट दूर करते हैं। ज्योतिर्विज्ञान के अध्ययन एवं उपयोग से दैवज्ञ को मानव जीवन के सभी क्षेत्रों के बारे में गहरी अंतर्दृष्टि प्राप्त हो जाती है।

आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्‍तमपुर गोरखपुर
Keywords: jyotish

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  1. वैदिक परंपरा में मंत्रोच्चारण का विशेष महत्व माना गया है. अगर सही तरीके से मंत्रों का उच्चारण किया जाए तो यह जीवन की दिशा ही बदल सकते हैं.

    बहुत से लोग मंत्रों को सही तरीके से उच्चारित नहीं कर पाते और जब मनचाहा फल प्राप्त नहीं होता तो उनका विश्वास डगमगाने लगता है. इसलिए आज मैं आपको एक ऐसा मंत्र बताने जा रही हूं जिसे सुनने या पढ़ने मात्र से आपकी समस्याओं का समाधान निकलने लगता है.

    शास्त्रों में ब्रह्मा जी को सृष्ष्टि का सृजनकार, महादेव को संहारक अौर भगवान विष्णु को विश्व का पालनहार कहा गया है. हिंदू धर्म में विष्णु सहस्रनाम सबसे पवित्र स्त्रोतों में से एक माना गया है.

    इसमेें भगवान विष्णु के एक हजार नामों का वर्णन किया गया है. मान्यता है कि इसके पढ़ने-सुनने से इच्छाएं पूर्ण होती हैं.
    यह है अत्यन्त शक्तिशाली मन्त्र, सिर्फ सुनने मात्र से ही खुल जाते है किस्मत के सभी बंद दरवाजे !

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  2. ज्योतिष शास्त्र पर आपकी व्याख्या बहुत ही सुंदर और सटीक है वास्तव मे ज्योतिष विद्या अद्भुत और विलक्षण आकाशीय पिंडों के संयोग से बनने वाले योगों कुयोगो के माध्यम से मानव जीवन पर पडने वाले शुभाशुभ प्रभावो का सतत निरीक्षण और आकलन के द्वारा फल कथन की एक पद्धति है ।
    आपने ग्रहो की तथ्यात्मक स्वरूप जो बताया है वह बहुत ही सराहनीय है क्योंकि विना तथ्यों को समझे फलकथन करना एक प्रकार का आत्मिय धोखा है इसलिए ग्रहो का प्राकृतिक स्वभाव प्रतीकात्मक स्वरूप आदि को समझना बहुत ही जरूरी होता है ।
    अंततः आपके इस सतत प्रयास को सार्थक करने के लिये इन सुविचारो को आत्मसात करने का प्रयास करूंगा ।
    ज्योतिर्विद अरविन्द शास्त्री
    astroarvind.blogspot.com

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