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ताजिया बनाते पूरन पासवान
गोरखपुर के बेनीगंज में हिंदू मुस्लिम एकता की अनूठी मिसाल देखने को मिलती है। यहां के हिंदू पूरन का परिवार मुसलमानों के लिए ताजिया का निर्माण करता है तो इसी मोहल्ले के समीउल्ला का परिवार रामलीला के लिए रावण का पुतला बनाता है। यह काम उन्होंने अपने पुरखों से सीखा है। दोनों के काम से उभरती गंगा-जमुनी तहजीब शहर के कौमी एकता व सद्भाव की झलक दिखाती है। बेनीगंज शहर के उन मुहल्लों में शामिल हैं जहां ङ्क्षहदू और मुसलमानों का परिवार लगभग समान संख्या में है और सभी लोग मेलजोल से रहते हैं।
रावण का पुतला बनाते अफजल
बेनीगंज ईदगाह रोड पर ताजिया बनाने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है लेकिन इसमें पूरन कुमार पासवान का एक ङ्क्षहदू परिवार भी है जो ताजिया का निर्माण करता है। पूरन न सिर्फ ताजिया बनाते और बेंचते हैं बल्कि बेनीगंज ईदगाह में ताजिया बैठाते भी हैं और नवीं मोहर्रम को रूदलपुर से जुलूस भी निकालते हैं। इस जुलूस में बड़ी संख्या में ङ्क्षहदू व मुस्लिम परिवार के लोग शामिल होते हैं। पूरन यह काम पिछले बीस वर्षों से कर रहे हैं। पूरन के ठीक सामने हमीदुल्ला का घर है, वही इनके उस्ताद थे, उन्होंने ही पूरन को ताजिया बनाना सिखाया था।
पूरन के घर के ठीक सटे समीउल्ला का घर है। समीउल्ला के यहां रामलीला के रावण का पुतला बनाने का पुस्तैनी कारोबार है। अब समीउल्ला नहीं हैं लेकिन उनके बेटे मुन्नू व पोते अफजल आज भी महानगर में होने वाली रामलीलाओं के लिए रावण व मेघनाद का पुतला, रावण दरबार व अशोक वाटिका का निर्माण करते हैं। शहर की सभी रामलीलाओं के लिए रावण के पुतले यहीं बनते हैं। मुन्नू व अफजल मिलकर इस समय पांच रावण, मेघनाद के पुतले, रावण दरबार व अशोक वाटिका का निर्माण कर रहे हैं। बर्डघाट व आर्यनगर की रामलीला का पुतला लगभग तैयार है, दो-एक दिन में वहां पहुंचा दिया जाएगा।
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महंगाई बढ़ी, कीमत नहीं
मैं इस वर्ष 14 ताजिया का निर्माण कर रहा हूं। अभी तक खरीदार नहीं आए हैं। पांचवीं मोहर्रम के बाद खरीदारों के आने की उम्मीद है। ताजिया की कीमत 500 रुपये से लेकर 4000 रुपये तक है। यही कीमत पिछले तीन साल से चल रही है। लगभग 25 प्रतिशत महंगाई बढ़ गई लेकिन लोग ज्यादा पैसे देने को राजी नहीं हैं, इसलिए कीमत नहीं बढ़ाई। मेरी आस्था है इसलिए बना रहा हूं।
-पूरन कुमार पासवान, ताजिया कारीगर, बेनीगंज
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पुतला बनाना पुस्तैनी है
रावण व मेघनाद का पुतला बनाना हमारी पुस्तैनी परंपरा है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी यह हस्तांतरित होती रही। आज भी हम लोग शहर की सभी रामलीलाओं के लिए पुतले बनाते हैं। महंगाई के हिसाब से कोई पैसा देने को राजी नहीं है, फिर भी हमारी परंपरा है, इसलिए इसका निर्वाह कर रहे हैं। पुतला बनाकर रामलीला मैदान में पहुंचाते हैं, उसे खड़ा भी कर देते हैं और पैसे के लिए दौडऩा पड़ता है।
-अफजल, रावण, मेघनाद पुतला कारीगर, बेनीगंज

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