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दीपावली महोत्सव धन त्रयोदशी से आरंभ होकर भैया दूज तक चलता है। इस पंचदिवसीय महोत्सव में कई पर्व एवं त्योहार मनाए जाते हैं।
प्रथम पर्व धन त्रयोदशी- वाराणसी से प्रकाशित पंचांग हृषिकेश के अनुसार 28 अक्टूबर दिन शुक्रवार को सूर्योदय 6 बजकर 25 मिनट और त्रयोदशी तिथि का मान सायं 6 बजकर 17 मिनट तक है। इसके बाद चतुर्दशी लग रही है। इस दिन के प्रमुख पर्व निम्नलिखित हैं-
1- आरोग्य के देवता धनवंतरि का पूजन व जयंती उत्सव।
2- भगवान कुबेर का पूजन।
3- बर्तन, आभूषण आदि नवीन वस्तुओं का क्रय।
4- सायंकाल दीपदान।
धन त्रयोदशी पर प्रात:काल अथवा मध्याह्न में धनवंतरि देवता का पूजन करें। ये भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार कार्तिक कृष्ण तेरस को समुद्र मंथन के दौरान धनवंतरि का प्राकट्य हुआ था। इसलिए इस तिथि को धनवंतरि जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।
धनतेरस पर धन प्रदाता कुबेर के पूजन का भी प्रचलन है। कुबेर धनाध्यक्ष हैं। वे देवताओं के खजांची हैं और सभी प्रकार के निधियों के स्वामी हैं। स्थायी धन प्राप्ति के लिए उनका पूजन किया जाता है। उनकी कृपा से धनागम में वृद्धि होती है और धन संचय संभव होता है।
धनत्रयोदशी पर बहुमूल्य वस्तुएं, बर्तन, आभूषण, दैनिक उपयोग की वस्तुएं, वाहन, भूमि, भवन इत्यादि का क्रय करना उत्तम माना जाता है। यह जया तिथि है, इसमें क्रय की गई वस्तुएं विशेष फलदायी होती हैं। सामान्यत: इस प्रकार का क्रय मध्याह्न या अपराह्न में किया जाता है। इस दिन चांदी एवं पीतल के बर्तन लाना विशेष शुभ माना गया है। त्रयोदशी तिथि के स्वामी भगवान शिव हैं और चांदी की उत्पत्ति भगवान शिव के नेत्रों से हुई है। यदि चांदी के बर्तन न खरीद सकें तो चांदी का एक सिक्का ही क्रय करें, इससे सौभाग्य की वृद्धि होती है। मान्यता यह है कि इस दिन घर में बर्तन इत्यादि लाने से धन-धान्य एवं संपदा आगामी धनतेरस तक बनी रहती है।
खरीदारी का मुहूर्त
1- प्रात: 6.25 से 7.49 बजे तक- चर बेला। फल- सामान्य।
2- प्रात: 7.49 से पूर्वाह्न 9.13 बजे तक लाभ बेला। फल- उत्तम।
3- पूर्वाह्न 9.13 से 10.37 बजे तक अमृत बेला। फल- विशेष लाभकारी।
इसके अलावा सायं 6.17 बजे तक खरीदारी की जा सकती है।
-धन त्रयोदशी से जुड़ी मान्यताओं में यह भी है कि इस दिन धन का आगमन होना चाहिए, गमन नहीं। इसलिए इस दिन धन आदि देना निषिद्ध बताया गया है।
-इस दिन प्रदोष काल में दीपदान किया जाता है। घर के मुख्य द्वार के सामने चारमुखा दीप जलाया जाता है। मान्यता है कि इस दीपदान से दीर्घायु प्राप्त होती है और अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
-इस वर्ष विशेष दिन शुक्रवार व संपूर्ण दिन व रात्रि हस्त नक्षत्र है जिससे अमृत नाम का औदायिक योग बन रहा है, ऐसा सुयोग कई वर्षों के बाद प्राप्त होता है। यह योग अक्षय फल प्रदान करता है।
-आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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