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करवाचौथ व्रत में चंद्रमा की पूजा का कारण है कि जब गणेशजी का शिरच्छेदन हुआ था तो वास्तविक सिर चंद्रलोक में चला गया था। पौराणिक मान्यता है कि वह सिर आज भी वहां विद्यमान है। इस व्रत में चंद्रमा, शिव, पार्वती और स्वामी कार्तिकेय की सविधि पूजा करने का विधान है। शिव -पार्वती की पूजा इसलिए की जाती है कि जिस प्रकार शैलपुत्री पार्वती ने घोर तपस्या कर भगवान शंकर को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था, वैसा ही उन्हें अखंड सौभाग्य प्राप्त हो।
गौरी पूजन का विवाहित महिलाओं व कन्याओं के लिए विशेष महत्व है। इस संदर्भ में एक कथा प्रसिद्ध है। पांडवों के वनवास के समय जब अर्जुन तप करने इंद्रकील पर्वत की ओर चले गए तो बहुत दिनों तक उनके वापस न लौटने पर द्रोपदी को चिंता हुई। श्रीकृष्ण ने द्रोपदी की चिंता दूर करते हुए उन्हें करवा चौथ व्रत करने की सलाह दी। इस संबंध में जो कथा शिव ने पार्वती को सुनाई थी, उसे भी सुनाई।
महात्य कथा- इन्द्रप्रस्थ नगरी में वेदशर्मा नामक एक विद्वान ब्राह्मण के सात पुत्र और एक पुत्री थी, जिसका नाम वीरावती था। उसका विवाह सुदर्शन नामक एक ब्राह्मण के साथ हुआ। ब्राह्मण के सभी पुत्र विवाहित थे। एक बार करवाचौथ के व्रत के समय वीरावती की भाभियों ने सविधि व्रत पूर्ण किया, परन्तु वीरावती सारा दिन निर्जल रहकर भूख न सहन कर सकी और निढाल होकर बैठ गई। भाइयों की चिंता पर भाभियों ने बताया कि वीरावती भूख से पीड़ित है। करवाचौथ का व्रत चंद्रमा का दर्शन करके ही खोलेगी। यह सुनकर भाइयों ने खेतों में जाकर आग जलाई और कपड़ा तानकर चंद्रमा जैसा दृश्य बना दिया। पुन: जाकर बहन से कहा कि चांद निकल आया है, अर्घ्य दे दो। यह देखकर वीरावती ने अर्घ्य देकर भोजन ग्रहण कर लिया। नकली चंद्रमा को अर्घ्य देने के कारण उसका व्रत खंडित हो गया और उसका पति अचानक बीमार पड़ गया। वह ठीक न हो सका। एक बार इन्द्र की पत्नी इन्द्राणी करवाचौथ का व्रत करने पृथ्वी पर आर्इं। सूचना मिलने पर वीरावती ने इन्द्राणी के पास जाकर प्रार्थना की कि उसके पति को स्वस्थ होने का उपाय बताएं। इन्द्राणी ने कहा कि तेरे पति की यह दशा तेरी ओर से रखे गए करवा चौथ व्रत के खंडित हो जाने की वजह से हुई है। यदि तुम करवा चौथ का व्रत पूर्ण विधि-विधान के साथ करो तो तुम्हार पति स्वस्थ हो जाएगा। वीरावती ने इन्द्राणी के कहने पर यह व्रत पूर्ण विधि-विधान के साथ किया और उसका पति स्वस्थ हो गया। इसके बाद ही यह व्रत प्रचलन में आया। यह व्रत पति-पत्नी के लिए नव प्रणय निवेदन व एक-दूसरे के प्रति पूर्ण समर्पण, अपार प्रेम, त्याग व उत्सर्ग की चेतना लेकर आता है।
व्रत विधान- व्रत में दो मिट्टी के करवे (टोटीदार मिट्टी पात्र) रखे जाते हैं। उनमें चार-चार सींके लगाई जाती हैं। करवे के अंदर जल व अक्षत और हो सके तो पंचरत्न भी डालें। उसके ऊपर ढकनी में चावल रख दिया जाता है। चावल के मध्य में एक दीपक रखा जाता है जो पूजन के समय जलाया जाता है। कुछ श्रद्धालु महिलाएं करवे के ऊपर ढकनी पर या उसके पास पुआ, मीठा या गुलगुला आदि रखती हैं। कुछ सुहागिनें आटा का चांद बनाकर भी करवे के पास रखती हैं। आटे में चावल के आटे का भी प्रयोग होता है। तारों का चिन्ह भी चांद के पास बनाया जाता है। पूजन के समय स्त्रियां पूरा श्रृंगार करके विधि पूर्वक पूजन करती हैं। पूजन के समय जल, अक्षत, धूप, अगरबत्ती, पुष्पमाला, घी, रूई, सिन्दूर की आवश्यकता होती है। साथ में गौरी की प्रतिमा भी बनाई जाती है जिसके सिन्दूर का सोहाग लिया जाता है।
संकल्प- पहले आचमन करके ऐसा संकल्प करें कि मैं अपने सौभाग्य हेतु करक चतुर्थी का व्रत करूंगी। संकल्प करके एक वट वृक्ष बनाकर उसके जड़ में शिव-पार्वती, गणेश व कार्तिकेय का चित्र बनाया जाता है या शिव परिवार का छपा चित्र स्थापित किया जाता है और पूजा की जाती है।
पूजा मंत्र- ऊं नम: शिवायै सर्वाग्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्। प्रयच्छ भक्ति युक्तानां नारीणां हरवल्लभे।। इस मंत्र से गौरी की पूजा करें। पुन: ऊं नम: शिवाय से शिवजी, कार्तिकेय व गणेश जी की श्रद्धा पूर्वक पूजा करें। करवे को पीले रंग से रंग दिया जाता है। पुन: विधि पूर्वक षोडशोपचार सामग्री से पूजा की जाती है। फिर एक स्त्री दूसरे से करवे की बदली करती है। करवा चौथ की कथा सुनती और सुनाती है। इसके बाद चंद्रोदय के समय चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। अर्घ्य के बाद गौरी से सोहाग लिया जाता है। तत्पश्चात अपने स्वामी (पति) के हाथों से जल और मिष्ठान ग्रहण किया जाता है। इसके बाद महिलाएं भोजन करती हैं। करवा चौथ की कथा वामन पुराण में लिखित है।
-आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’आँखों ही आँखों में इशारा हो गया - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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