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मर्यादा पुरुषोत्तम राम लोक जीवन और लोक मानस से इतने निकट रहे हैं कि उनकी जीवन कथा खुद जीवन भर भरोसा दिलाने वाली है। वास्तव में राम का व्यक्तित्व कमजोर लोगों को प्रतिनिधित्व देता है, आत्मविश्वास प्रदान करता है। वे दबे लोगों के सहारे एक न्यायनिष्ठ राज्य प्रदान करने का प्रयास करते हैं। अन्याय के विरुद्ध न्याय के संघर्ष पर श्रद्धा इस कथा के मूल में है। यही वजह है कि रामायण भारत से बाहर विदेशों में जहां भी गया, उसने सबको रमाया तथा लोगों के दिलों में नूतन जीवन में संचेतना जाग्रत की। रामकथा को अंग्रेजी साहित्य में स्थान दिलाने का सर्वप्रथम श्रेय फ्रेडरिक सालमन ग्राउच को दिया जाता है जिन्होंने प्रथम बार श्रीरामचरितमानस का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया जिसका प्रथम संस्करण 1883 में प्रकाशित हुआ। अंग्रेजी में ग्राउच के अलावा रेव हिल ने भी मानस का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया है जो बहुत ही असरकारी ढंग किया गया है। श्रीरामचरतिमानस को अंग्रेजी पद्य में अनुवाद करने का श्रेय जी. एटाकिंस को मिला जिन्होंने पद्यानुवाद करते समय तुलसी की छंद योजना पूर्ण निष्ठा के साथ पालन किया तथा लय और तुक का भी भरसक ध्यान रखा है। फ्रांस में रामकथा ने काफी शोहरत पाई है। फ्रांसीसी भाषा के विख्यात मनीषी गार्सा द तासी ने सुंदरकांड का अनुवाद किया। फ्रेंच भाषा में डेनोविली ने भी संक्षिप्त रामकथा लिखी थी। फ्रांस के विख्यात लेखक इयोलित फोस ने वाल्मीकि रामायण का फ्रांसीसी भाषा में अनुवाद किया था लेकिन बाद में इसकी लोकप्रियता देखते हुए उन्होंने महाभारत जैसे भव्य शास्त्र का भी अनुवाद कर दिया था। 1903 में फ्रांसीसी लेखक रसेल ने श्रीरामचरितमानस से प्रभावित होकर वाल्मीकि रामायण का पुन: नए रूप में अनुवाद किया। सन 1950 में फ्रांस की लेखिका शारतोल वादवेलि ने रामचरित मानस के विभिन्न कांडों का अनुवाद किया था और तुलसीकृत रामायण के स्रोत तथा उनकी रचना पर अनुसंधान किया। रूस में श्रीरामचरितमानस अत्यंत लोकप्रिय है। इसकी लोकप्रियता का श्रेय रूसी विद्वान प्रो. वारान्निकोव को जाता है, उन्होंने रूसी भाषा में श्रीरामचरितमानस का पद्यानुवाद किया जिसका प्रकाशन 1948 में हुआ। इस अनुवाद के लिए उन्हें सोवियत संघ के सर्वोच्च पुरस्कार 'आर्डर ऑफ लेनिनÓ से सम्मानित किया गया था। रूसी विद्वान लियो टॉलस्टॉय ने अपने तमाम उद्धरणों में भगवान राम के आदर्श की कई झलकियां प्रस्तुत की हैं। हॉलैंड के ए रोजरियर ने डच इंडिया कंपनी के पादरी की हैसियत से रामकथा का प्रकाशन 'द आपेन दोरेÓ सन 1691 में किया था। इस पुस्तक में राम के अयोध्या गमन तक का उल्लेख वाल्मीकि रामायण के अनुसार ही किया गया है। इस तरह विश्व के अनेक लेखकों ने श्रीरामचरितमानस पर कार्य किया है और इसके गौरव से विश्व को परिचित कराया है।
-आचार्य शरदचंद्र मिश्र
430 बी, आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

Keywords: dharm, ram, hindu

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