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15 अक्टूबर को निशीथ व्यापिनी पूर्णिमा है। इस दिन सूर्योदय 6 बजकर 16 मिनट पर और चतुर्दशी तिथि दिन में 12 बजकर 23 मिनट तक है। इसके बाद पूर्णिमा लग रही है। संपूर्ण रात्रि पूर्णिमा है। इसलिए व्रत-अर्चन के लिए यही तिथि मान्य है। 'कृत्य निर्णयÓ ग्रंथ के अनुसार इस पूर्णिमा को ऐरावत पर आरूढ़ हुए इंद्र और महालक्ष्मी का पूजन करना चाहिए और रात्रि के समय घृतपूरित और गंध पुष्पादि से सुपूजित अनेकानेक दीपकों को प्रज्वलित कर देव मंदिरों, बाग-बगीचों, तुलसी और अश्वत्थ के वृक्षों तले, रास्ते, चौराहों, गलियों और भवनों की छत पर रखना चाहिए। प्रात:काल होने स्नानादि कर इंद्र का पूजन करें। ब्राह्मणों व सत्पात्रों को घी-शक्कर मिली हुई खीर का भोजन कराकर वस्त्र या दक्षिणा आदि प्रदान करें। यह अनंत फल देने वाला है। इसे कोजागर व्रत कहते हैं। इस दिन रात्रि के समय इंद्र और लक्ष्मी का प्रश्न रहता है- कौन जागता है? इसलिए इस रात्रि में जागरण किया जाता है और इंद्र तथा लक्ष्मी के मंत्रों का जप या स्तोत्र पाठ का विधान है। जो इस रात्रि में जगता है और इन दोनों देवताओं का पूजन-अर्चन करता है, वह विपुल संपदा प्राप्त करता है। शरद पूर्णिमा की रात्रि में आकाश निर्मल रहता है। पुराणों के अनुसार चांदनी में अमृत का निवास होता है। कहा जाता है कि चंद्रमा की किरणों से अमृत झरता है। इसलिए इस रात्रि को खीर बनाकर खुले आकाश के नीचे रख दिया जाता है और सुबह उसे प्रसाद के लिए रूप में पूरे परिवार को दिया जाता है। इस खीर को खाने से आरोग्य की प्राप्ति होती है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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  1. शरद पुर्णिमा में चांदनी में खीर रखने की पंरमपरा रही है। धन्यवाद याद दिलाने के लिये।

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